नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित संभल हिंसा मामले में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA – National Security Act, 1980) के तहत जारी प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने गैर-कानूनी तरीके से हिरासत आदेश जारी करने पर सख्त टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का भारी जुर्माना ठोंका है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मंगलवार (29 सितंबर 2026) को फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह से पलट दिया, जिसमें मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत को सही ठहराया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: “सिर्फ ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन’ के आधार पर NSA नहीं लगाया जा सकता”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन के प्रिवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर पर गंभीर सवाल उठाए:
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शक्तियों का दुरुपयोग: अदालत ने पाया कि डिटेंशन ऑर्डर जारी करने वाले अधिकारियों ने अन्य परिस्थितियों और साक्ष्यों पर विचार किए बिना केवल पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे के आधार पर ही एनएसए लगा दिया, जो कि अपनी शक्तियों का स्पष्ट दुरुपयोग है।
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केवल आपराधिक मामले आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होना या केवल पुलिस हिरासत में कही गई बात ही प्रिवेंटिव डिटेंशन का सही कानूनी आधार नहीं बन सकती।
अदालत ने ‘रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य’ और ‘अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य’ के पुराने लैंडमार्क फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ठोस सबूतों के बिना केवल आशंका के आधार पर किसी नागरिक को प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखना असंवैधानिक है।
क्या था पूरा मामला?
संभल स्थित ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-ऑर्डर्ड सर्वे के बाद इलाके में भारी हिंसा भड़क गई थी, जिसमें चार लोगों की जान चली गई थी:
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54 दिन बाद गिरफ्तारी: हिंसा के लगभग 54 दिन बाद पुलिस ने मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी थी।
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NSA डिटेंशन ऑर्डर: इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को जिला प्रशासन ने मुल्ला अफरोज के खिलाफ NSA के तहत डिटेंशन ऑर्डर जारी कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इस एहतियाती हिरासत को सही ठहराए जाने के बाद मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में यह भी तर्क दिया गया था कि हिंसा के दौरान पुलिस की ओर से हुई गोलीबारी की निष्पक्ष जांच नहीं की गई, जिसके लिए विरोध याचिका (Protest Petition) दाखिल करने की अनुमति मांगी गई है।
सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से जहां राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को बड़ा झटका लगा है, वहीं सार्वजनिक व्यवस्था और प्रिवेंटिव डिटेंशन के कानूनों के कड़े क्रियान्वयन को लेकर एक कड़ा संदेश गया है।
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