
विधानसभा चुनावों से ठीक पहले संगठन में बड़ा फेरबदल करने की रणनीति कांग्रेस के लिए एक बार फिर बड़ी परीक्षा बन गई है। पार्टी आलाकमान ने पंजाब विधानसभा चुनाव से महज 5 महीने पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (प्रधान) को बदलने का बड़ा फैसला लिया है। इस कड़ी में पिछले साढ़े चार साल से पंजाब कांग्रेस की कमान संभाल रहे अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग से इस्तीफा ले लिया गया है। हालांकि, चुनावी मुहाने पर आकर अध्यक्ष बदलने का यह प्रयोग कांग्रेस के लिए कोई नया नहीं है। अगर बीते कुछ सालों के चुनावी रुझानों और आंकड़ों को देखें, तो यह रणनीति पार्टी के लिए संजीवनी बनने के बजाय ज्यादातर राज्यों में घाटे का सौदा ही साबित हुई है।
वर्ष 2019 से लेकर अब तक कांग्रेस आलाकमान देश के 12 प्रमुख राज्यों में ऐन चुनाव से पहले अपने प्रदेश अध्यक्षों की छुट्टी कर चुका है। इनमें महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, बिहार और झारखंड जैसे सियासी रूप से बेहद अहम राज्य शामिल हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिन 12 राज्यों में चुनाव से ठीक पहले कमान बदली गई, उनमें से 10 राज्यों में कांग्रेस को शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा है। केवल दो राज्यों में ही पार्टी किसी तरह सत्ता या गठबंधन के सहारे टिकी रह सकी।
ऐन मौके पर अध्यक्ष बदलने का रिकॉर्ड, 12 राज्यों में क्या रहे नतीजे
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महाराष्ट्र (2019): चुनाव से ठीक 3 महीने पहले अशोक चव्हाण को हटाकर बालासाहेब थोरात को कमान सौंपी गई। नतीजों में कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गई।
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हरियाणा (2019): मतदान से महज 47 दिन पहले अशोक तंवर की छुट्टी कर कुमारी शैलजा को अध्यक्ष बनाया गया। कांग्रेस यह चुनाव बुरी तरह हार गई और बाद में शैलजा ने राज्य की राजनीति से दूरी बना ली।
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झारखंड (2019): चुनाव से पहले अजय कुमार की जगह रामेश्वर उरांव को कमान मिली। जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन को जीत तो मिली, लेकिन सरकार में कांग्रेस की स्थिति काफी कमजोर रही।
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पश्चिम बंगाल (2021): चुनाव से 7 महीने पहले फायरब्रांड नेता अधीर रंजन चौधरी को कमान दी गई। हालांकि, अधीर भी कोई करिश्मा नहीं कर सके और कांग्रेस का बंगाल में खाता तक नहीं खुला।
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त्रिपुरा (2021): विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बिराजीत सिन्हा को नया अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन वे भी पार्टी की किस्मत नहीं बदल पाए और कांग्रेस को हार मिली।
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छत्तीसगढ़ (2023): चुनाव से केवल 4 महीने पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दौर में मोहन मरकाम को हटाकर दीपक बैज को कमान दी गई। सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस चुनाव हार गई और बैज अपने ही इलाके में पार्टी को नहीं बचा सके।
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जम्मू-कश्मीर (2024): चुनाव से पहले विकार रसूल वानी को हटाकर तारिक हमीद कर्रा को कमान सौंपी गई। हालांकि गठबंधन की सरकार बनी, लेकिन कांग्रेस को इसका कोई खास सियासी फायदा नहीं मिला।
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झारखंड (2024): चुनाव से 3 महीने पहले राजेश सिंह की जगह केशव महतो कमलेश को जिम्मेदारी दी गई। पार्टी को बड़ी सफलता नहीं मिली, उल्टे जेएमएम का जनाधार बढ़ा और कैबिनेट में भी कांग्रेस को नजरअंदाज होना पड़ा।
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बिहार (2025): चुनाव से 8 महीने पहले अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर दलित चेहरे के रूप में राजेश राम को अध्यक्ष बनाया गया। कांग्रेस बुरी तरह फ्लॉप रही और राजेश राम खुद अपनी सीट नहीं बचा सके।
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असम (2025): चुनाव से 11 महीने पहले भूपेन बोरा को हटाकर गौरव गोगोई को कमान दी गई। गोगोई खुद अपना चुनाव हार गए और पार्टी महज 18 सीटों पर सिमट गई।
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दिल्ली (2025): विधानसभा चुनाव से ठीक पहले देवेंद्र यादव को कमान सौंपी गई, लेकिन वे कोई कमाल नहीं कर सके और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला।
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केरल (2026): चुनाव से पहले केसी वेणुगोपाल के करीबी समझे जाने वाले सनी जोसेफ को अध्यक्ष बनाया गया। केरल में कांग्रेस गठबंधन सत्ता में वापसी करने में कामयाब रहा।
पंजाब में 2022 का अनुभव और मौजूदा चुनौतियां
पंजाब में चुनाव से ठीक पहले अध्यक्ष बदलने का प्रयोग कांग्रेस 2022 के विधानसभा चुनाव में भी कर चुकी है। तब चुनाव से 7 महीने पहले सुनील जाखड़ की जगह नवजोत सिंह सिद्धू को प्रधान बनाया गया था। इतना ही नहीं, पार्टी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम की कुर्सी दी थी। सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी और खुद चन्नी अपनी दोनों सीटों से चुनाव हार गए थे।
इस बार भी पंजाब कांग्रेस के लिए राह बिल्कुल आसान नजर नहीं आ रही है। पार्टी के भीतर अंदरूनी गुटबाजी अपने चरम पर है। वहीं राज्य में ‘वारिस पंजाब दे’ जैसा संगठन तेजी से अपना दायरा बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ, सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की जमीन पर मजबूत पकड़ बनी हुई है और भारतीय जनता पार्टी भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में आक्रामक चुनावी रणनीति के साथ मैदान में उतर चुकी है। ऐसे में चुनाव से 5 महीने पहले राजा वड़िंग का इस्तीफा और नया फेरबदल कांग्रेस के लिए कितना फायदेमंद होगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।















