नई दिल्ली: दिल्ली की सड़कों और दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के साउथ कैंपस में इन दिनों एक ऐसा नारा गूंज रहा है, जो सुनने में भले ही तुकबंदी या हल्का-फुल्का लगे, लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल बेहद कड़वा और गंभीर है— ‘एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा?’ लेडी श्रीराम कॉलेज, मिरांडा हाउस और गार्गी कॉलेज सहित विभिन्न संस्थानों की छात्राओं द्वारा लगाए जा रहे इस नारे का उद्देश्य महिलाओं की रोजमर्रा की सुरक्षा, सार्वजनिक स्थानों पर डर और उनकी आवाजाही पर लगने वाली बंदिशों पर सीधा प्रहार करना है।
छात्राओं का यह विरोध प्रदर्शन दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 साल की नाबालिग लड़की के साथ हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म के बाद तेज हुआ। 23 सितंबर 2026 से शुरू हुआ यह आंदोलन अब सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिल्ली-एनसीआर की सड़कों, पार्क, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और रात के अंधेरे में लड़कियों द्वारा महसूस किए जाने वाले डर के खिलाफ एक बड़ा अभियान बन चुका है।
आस्था कुंज गैंगरेप और हिंदू कॉलेज की घटना ने भड़काया गुस्सा
21 सितंबर 2026 को लेडी श्रीराम कॉलेज से महज दो किलोमीटर दूर स्थित आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीया नाबालिग के साथ खुद को पुलिसकर्मी बताने वाले तीन आरोपियों ने गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया था। पुलिस ने पॉक्सो (POCSO) और बीएनएस (BNS) के तहत मामला दर्ज कर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।
इसके तुरंत बाद हिंदू कॉलेज की दो छात्राओं के साथ पीछा करने और उन्हें जबरन गाड़ी में खींचने के प्रयास की घटना सामने आई। सितंबर महीने में ही दिल्ली-एनसीआर में यौन उत्पीड़न के कम से कम 13 मामले दर्ज किए गए। इन घटनाओं के बाद 29 सितंबर को सैकड़ों छात्रों ने सड़कों पर उतरकर महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल, बेहतर पुलिस गश्त और बिना किसी डर के रात में भी आने-जाने की आजादी की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान, उपराज्यपाल ने भी बुलाई बैठक
दिल्ली में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और छात्राओं के प्रदर्शन का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि पार्क, बस, मेट्रो और सड़कें खराब स्ट्रीट लाइट्स, सीसीटीवी कैमरों की कमी या पुलिस गश्त न होने के कारण असुरक्षित नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर बल दिया है।
दूसरी ओर, दिल्ली के उपराज्यपाल (LG) ने भी महिला कॉलेजों के आसपास की सड़कों पर अंधेरे, असुरक्षित पार्कों और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी की समस्याओं को दूर करने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की है।
क्या कहते हैं आंकड़े: अपरिचितों से ज्यादा जान-पहचान वाले ही बनते हैं खतरा
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और हालिया रिपोर्ट्स के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा का खतरा केवल अनजान पुरुषों से नहीं होता:
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97% मामलों में परिचित ही आरोपी: 2024 में नाबालिग बच्चियों से जुड़े रेप के 97% मामलों में आरोपी पीड़िता का रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी या पारिवारिक परिचित था।
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2020-2024 का आंकड़ा: 16 से 18 वर्ष की लड़कियों से जुड़े 94,503 रेप केस दर्ज किए गए।
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चार गुना बढ़े अपराध: 2015 में 18 साल से कम उम्र की बच्चियों के रेप के 10,934 केस दर्ज थे, जो 2024 में बढ़कर 43,675 हो गए। हालांकि, 2024 में इस तरह के मामलों में सजा की दर (Conviction Rate) केवल 30% रही, जबकि 86% मामले अदालतों में लंबित हैं।
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घरेलू हिंसा: NFHS (2019-21) के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की 29.3% महिलाओं ने अपने पार्टनर से शारीरिक या यौन हिंसा झेली है।
‘सुरक्षा के नाम पर हमारी आजादी पर न लगे पाबंदी’
छात्राओं का कहना है कि प्रशासन अक्सर घटनाओं के बाद लड़कियों को ही रात में बाहर न निकलने, अकेले न घूमने या घर में रहने की सलाह देने लगता है। ‘रैपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं’ और ‘रातों पर भी हक है हमारा’ जैसे नारों के माध्यम से DU की छात्राएं स्पष्ट संदेश दे रही हैं कि सुरक्षा का मतलब बंदिशें नहीं, बल्कि बिना किसी डर के पढ़ने, काम करने और सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल करने की आजादी है।














