सत्ता के शिखर पर बेमिसाल 25 साल : 1974 के उस राजनीतिक भूचाल से मोदी के ‘अपराजित’ युग तक की पूरी कहानी

राजनीति में सत्ता अकसर नेताओं की लोकप्रियता को निगल जाती है, लेकिन भारतीय राजनीति के पटल पर एक ऐसा चेहरा भी है जिसके लिए यह नियम पूरी तरह अपवाद साबित हुआ। 7 अक्टूबर 2001 को जब गुजरात की कमान एक नए चेहरे को सौंपी गई थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है। आज नरेंद्र मोदी को लगातार सत्ता के शिखर पर रहते हुए पूरे 25 साल पूरे हो चुके हैं। 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री और उसके बाद से लगातार देश के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते हुए वे देश के पहले ऐसे नेता बन गए हैं, जो एक दिन भी सत्ता से बाहर रहे बिना 25 वर्षों से शीर्ष पद पर बने हुए हैं।

1974 का वो दौर जब गुजरात बना था अस्थिरता और आंदोलनों का केंद्र

आज भले ही गुजरात विकास और राजनीतिक स्थिरता का मॉडल माना जाता हो, लेकिन 1970 और 80 के दशक में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत थी। वर्ष 1974 में चिमन भाई पटेल के मुख्यमंत्री रहते हुए राज्य में उग्र छात्र आंदोलन छिड़ा, जिसने पूरी सरकार को हिलाकर रख दिया। इसके बाद गुजरात में राजनीतिक अस्थिरता का ऐसा दौर शुरू हुआ कि कोई भी नेता कुर्सी पर टिक नहीं सका। चिमन भाई पटेल मात्र 207 दिन ही पद पर रह सके और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। इसके बाद आए बाबू भाई पटेल भी केवल 268 दिन ही सरकार चला सके।

राष्ट्रपति शासन और मुख्यमंत्रियों की अदला-बदली का अंतहीन सिलसिला

गुजरात की राजनीति में उथल-पुथल का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। 1976 में कांग्रेस के माधव सिंह सोलंकी सत्ता में आए, लेकिन केंद्र में सत्ता बदलते ही 1977 में बाबू भाई पटेल फिर वापस लौटे। इंदिरा गांधी की वापसी के साथ ही 111 दिनों का राष्ट्रपति शासन फिर लगा। छठी और सातवीं विधानसभा के दौरान माधव सिंह सोलंकी और अमर सिंह चौधरी के बीच मुख्यमंत्रियों की अदला-बदली चलती रही। अमर सिंह को हटाकर राजीव गांधी सरकार ने सोलंकी को फिर कमान दी, जो मात्र 84 दिन ही टिक सके। आठवीं विधानसभा में जनता दल के चिमन भाई पटेल फिर आए, पर तीन साल 350 दिन में ही सरकार अल्पमत में आ गई। इसके बाद छबील दास मेहता, 1995 में बीजेपी के केशू भाई पटेल (221 दिन), सुरेश मेहता (334 दिन), वाघेला की राष्ट्रीय जनता पार्टी और दिलीप पारीख (128 दिन) जैसे कई प्रयोग हुए, लेकिन स्थिरता नदारद रही।

‘खाम’ पॉलिटिक्स का दौर और बिखरता सामाजिक ताना-बाना

गुजरात में सिर्फ राजनीतिक अस्थिरता ही नहीं थी, बल्कि यह राज्य तीखे जातीय और सांप्रदायिक प्रयोगों की प्रयोगशाला बन चुका था। 1960 में बॉम्बे प्रांत से अलग होकर बने गुजरात में कांग्रेस नेता माधव सिंह सोलंकी और गांधीवादी नेता झीनाभाई दर्जी ने ‘KHAM’ (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) राजनीति का फॉर्मूला तैयार किया। इस समीकरण ने 1980 और 1985 के चुनावों में कांग्रेस को बंपर जीत तो दिलाई, लेकिन इसने राज्य के पारंपरिक व्यापारी वर्ग, पटेलों और ब्राह्मणों को हाशिए पर धकेल दिया। नतीजा यह हुआ कि गुजरात में जातीय तनाव बढ़ा, अहमदाबाद के कारखाने बंद होने लगे, सूरत का वस्त्र और हीरा उद्योग प्रभावित हुआ और प्रशासनिक भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया।

भूकंप की तबाही के बीच नरेंद्र मोदी की एंट्री और ऐतिहासिक मोड़

1998 में मध्यावधि चुनावों के जरिए केशूभाई पटेल दोबारा सत्ता में आए। सब कुछ ठीक चल ही रहा था कि 26 जनवरी 2001 को कच्छ में आए विनाशकारी भूकंप ने पूरे राज्य को तबाह कर दिया। राहत और पुनर्वास कार्यों में ढिलाई के आरोपों के बीच 7 अक्टूबर 2001 को बीजेपी संगठन ने बड़ा फैसला लेते हुए दिल्ली और राज्यों में संगठन संभाल रहे नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया। हालांकि, पद संभालने के महज चार महीने बाद 27 जनवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आगजनी की घटना हुई, जिसमें 58 श्रद्धालु मारे गए। इसके बाद भड़की भीषण सांप्रदायिक हिंसा में 790 मुस्लिम और 294 हिंदू मारे गए, जिसने नई सरकार के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दीं।

‘वाइब्रेंट गुजरात’ से राष्ट्रीय पटल तक: एक अजेय राजनीतिक सफर

दंगों के उस कठिन दौर से निकलकर नरेंद्र मोदी ने गुजरात को विकास और उद्यमशीलता के नए रास्ते पर मोड़ा। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ जैसे अभियानों के जरिए उन्होंने राज्य में निवेश का माहौल बनाया, जिससे वर्षों से चली आ रही सांप्रदायिक और जातीय हिंसा पर हमेशा के लिए विराम लग गया। 22 मई 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके शानदार ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए बीजेपी ने उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया। इसके बाद 2014, 2019 और 2024 के आम चुनावों में मिली ऐतिहासिक सफलताओं ने यह साबित कर दिया कि जनता का उन पर भरोसा आज भी उतना ही अटूट है। पिछले ढाई दशकों में भारत की वैश्विक साख और अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाले नरेंद्र मोदी का यह सफर भारतीय राजनीति शास्त्रियों के लिए शोध का एक अहम विषय बन चुका है।

 

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