मुलायम सिंह यादव की विरासत और अखिलेश यादव की सियासत: पिता के संघर्ष से पुत्र की ‘PDA’ रणनीति तक समाजवादी पार्टी का पूरा सफर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी (सपा) का सफर भारतीय लोकतंत्र के सबसे दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरे अध्यायों में से एक है। नेताजी मुलायम सिंह यादव ने जिस राजनीतिक पूंजी को अपने लंबे जमीनी संघर्ष, सामाजिक समीकरणों और मजबूत सांगठनिक पकड़ के सहारे खड़ा किया था, आज अखिलेश यादव उसके एकमात्र ध्वजवाहक बनकर खड़े हैं। 2012 में अखिलेश को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपने से लेकर 2017 के पारिवारिक सत्ता संग्राम, 2019 के असफल प्रयोगों और आखिरकार 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक सफलता तक—अखिलेश यादव ने यह साबित कर दिया है कि वे न केवल पिता की विरासत को संभालने में सक्षम हैं, बल्कि उसे नए दौर की राजनीति के अनुकूल ढालने का हुनर भी रखते हैं।

2017 की पारिवारिक कलह और फिर मुलायम का पीछे हटना

जनवरी 2017 में जब समाजवादी पार्टी के भीतर वर्चस्व की लड़ाई चरम पर थी, तब अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला। उस वक्त यह कयास लगाए जा रहे थे कि दशकों पुरानी यह पार्टी बिखर जाएगी। लेकिन नेताजी मुलायम सिंह यादव ने वक्त रहते बड़ा दिल दिखाया और पुत्र की राह आसान करने के लिए खुद पीछे हट गए।

शुरुआत में नेतृत्व का यह बदलाव मुलायम सिंह को पूरी तरह मंजूर नहीं था, क्योंकि यह लड़ाई केवल पद की नहीं, बल्कि उस जनाधार और राजनीतिक विरासत पर नियंत्रण की थी जिसे उन्होंने खून-पसीने से सींचा था। पिता अपनी जिंदगी में उस पर पकड़ बनाए रखना चाहते थे, तो दूसरी तरफ पार्टी को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए पुत्र को सख्त फैसलों की जरूरत महसूस हो रही थी। आखिरकार पिता मान गए और अखिलेश के हाथ में पार्टी की कमान आ गई। इसके बाद राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यही था—क्या अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव द्वारा तैयार की गई राजनीतिक पूंजी को बचा पाएंगे?

2017: पिता की असहमति और कांग्रेस संग गठबंधन का असफल प्रयोग

पारिवारिक खींचतान से उबरने के बाद अखिलेश यादव के सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव था। इस चुनाव में मुलायम सिंह यादव की असहमति के बावजूद अखिलेश ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया।

नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। 2012 के चुनाव में 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने वाली सपा 2017 में महज 47 सीटों (गठबंधन में कांग्रेस को 7 सीटें) पर सिमट गई। 312 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता पर कब्जा जमाया। हालांकि, इस हार के पीछे केवल कांग्रेस से गठबंधन ही वजह नहीं था; लंबे समय की एंटी-इंकंबेंसी और 2014 के मोदी लहर के प्रभाव ने भी अहम भूमिका निभाई थी। फिर भी, संदेश यही गया कि पिता की राय को नजरअंदाज करना अखिलेश के लिए पहला बड़ा झटका साबित हुआ।

2019 का बीएसपी गठबंधन: घाटे का सौदा और दूसरा बड़ा सबक

2017 के झटके के बाद अखिलेश यादव ने 2019 के आम चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के साथ गठबंधन कर पूरे देश को चौंका दिया। 1995 के चर्चित गेस्ट हाउस कांड के बाद से मुलायम सिंह और मायावती के रिश्ते बेहद तल्ख रहे थे। मुलायम सिंह इस बेमेल गठबंधन की स्थिरता को लेकर आशंकित थे।

अखिलेश यादव का मानना था कि सपा का यादव-मुस्लिम (M-Y) समीकरण और बीएसपी का दलित वोट बैंक मिलकर भाजपा के विजय रथ को रोक देगा। लेकिन चुनाव नतीजों ने दिखाया कि यह समझौता बीएसपी के लिए तो फायदेमंद रहा (जो 0 से बढ़कर 10 सीटों पर पहुंच गई), लेकिन सपा 5 सीटों पर ही सीमित रह गई। चुनाव खत्म होते ही मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया। इस तरह मुलायम सिंह की राय को दूसरी बार नजरअंदाज करने का फैसला सपा के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ।

2022 की वापसी और 2024 का ‘PDA’ फॉर्मूला: अखिलेश का मास्टरस्ट्रोक

2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने रणनीति बदली और बड़े दलों के बजाय छोटे व क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया। हालांकि भाजपा 255 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखने में कामयाब रही, लेकिन सपा ने अपनी सीटों की संख्या 47 से बढ़ाकर 111 कर ली। पार्टी का वोट प्रतिशत भी बढ़कर 32.06% हो गया, जो 2012 के ऐतिहासिक जीत वाले वोट शेयर (29.15%) से भी अधिक था। इसने यह संदेश दे दिया कि अखिलेश पार्टी के जनाधार को वापस संगठित करने में सफल रहे हैं।

असली क्रांति 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिली। अखिलेश यादव ने ‘PDA’—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—का एक नया सामाजिक और चुनावी रसायन तैयार किया। इस बार कांग्रेस के साथ अपनी शर्तों पर चुनावी तालमेल बैठाया। नतीजों ने भारतीय राजनीति को चौंका दिया; उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से सपा ने अकेले 37 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं, जबकि सत्तारूढ़ भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई। यह सपा का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रहा, जिसने पार्टी कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह भर दिया।

2027 के विधानसभा चुनाव की राह और कांग्रेस के साथ समीकरण

मुलायम सिंह यादव के दौर में सपा मुख्य रूप से एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर निर्भर थी, लेकिन अखिलेश ने इसे व्यापक बनाकर ‘PDA’ के बैनर तले सभी वंचित वर्गों को एक साथ लाने का काम किया है। आज सैफई कुनबा पूरी तरह एकजुट है, शिवपाल यादव समेत पूरा परिवार अखिलेश के नेतृत्व को स्वीकार कर चुका है।

आगामी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। बीएसपी के लगातार कमजोर होने और कांग्रेस के सीमित सांगठनिक आधार के कारण आज मुख्य मुकाबला सीधे तौर पर भाजपा और सपा के बीच ही नजर आ रहा है। अखिलेश यादव गैर-भाजपा वोटों का बिखराव रोकने के लिए कांग्रेस को साथ जरूर रखेंगे, लेकिन गठबंधन की शर्तें पूरी तरह सपा तय करेगी। मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत को सहेजते हुए अखिलेश यादव अब खुद को उत्तर प्रदेश में एक परिपक्व और मुख्य राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित कर चुके हैं। 

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