Supreme Court Hearings: सुप्रीम कोर्ट ने तय की चुनाव आयोग, SIR और दिल्ली प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की तारीखें; जानें कब किस मामले पर होगी बहस

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली के विभिन्न प्रदर्शनों, चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण याचिकाओं पर सुनवाई के लिए नया और स्पष्ट शेड्यूल जारी कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी मामलों को एक साथ मिलाने के बजाय उनके विषय और कानूनी पहलुओं के आधार पर अलग-अलग समूहों (Groups) में बांट दिया है, जिससे सुनवाई प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सके।

राहुल गांधी और असदुद्दीन ओवैसी की याचिकाओं पर 27 अक्टूबर को होगी सुनवाई

शीर्ष अदालत ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी तथा अन्य याचिकाकर्ताओं की अर्जियों पर सुनवाई के लिए 27 अक्टूबर की तारीख तय की है।

  • मुद्दा: यह याचिकाएं चुनाव आयोग के कामकाज के तरीके और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को चुनौती देती हैं।

  • इसमें मुख्य रूप से चुनाव आयोग की भूमिका और वोटर लिस्ट तैयार करने की कार्यप्रणाली पर गंभीर कानूनी सवाल उठाए गए हैं।

तारीख-दर-तारीख जानें कब होगी किस मामले पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न विवादित और संवेदनशील मामलों को अलग-अलग दिनों में सुनने का फैसला किया है:

सुनवाई की तारीख मामला / विषय मुख्य बिंदु
27 अक्टूबर चुनाव आयोग और SIR याचिकाएं राहुल गांधी और असदुद्दीन ओवैसी की याचिकाएं; वोटर लिस्ट पुनरीक्षण और ईसी की कार्यप्रणाली पर सवाल।
3 नवंबर दिल्ली के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और उससे जुड़े कानूनी पहलू।
5 नवंबर महिला पत्रकारों का यौन उत्पीड़न मामला दिल्ली के प्रदर्शनों के दौरान महिला पत्रकारों के कथित यौन उत्पीड़न से जुड़ी विशेष याचिका।
19 नवंबर BNSS की धारा 172 और 163 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 172 (पुलिस निर्देशों का पालन) और धारा 163 (निषेधाज्ञा/धारा 144 जैसे प्रावधान) की संवैधानिक वैधता को चुनौती।

नोडल वकीलों को दिए गए खास निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़े नोडल वकीलों (Nodal Lawyers) को निर्देश दिया है कि वे 28 अक्टूबर तक एक जैसे मुद्दों वाली تمام याचिकाओं को करीने से समूहों में विभाजित कर लें। अदालत का मानना है कि ऐसा करने से एक जैसे मामलों में व्यापक जवाबी हलफनामे (Comprehensive Counter Affidavits) दाखिल करना आसान होगा और सभी महत्वपूर्ण कानूनी तथा तथ्यात्मक पहलू अदालत के सामने पूरी स्पष्टता के साथ रखे जा सकेंगे।

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