नीला ड्रम सौरभ हत्याकांड: 163 पेज के फैसले में जज की कातिल मुस्कान-साहिल पर सख्त टिप्पणियां; बोले- यह अपराध सामाजिक भरोसे को पूरी तरह खत्म करने जैसा

मेरठ।  पश्चिम उत्तर प्रदेश को दहला देने वाले बहुचर्चित ‘नीले ड्रम वाले सौरभ हत्याकांड’ में जिला एवं सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने अपने 163 पन्नों के ऐतिहासिक और विस्तृत फैसले में बेहद सख्त टिप्पणियां की हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि एक विवाहिता द्वारा अपने अवैध संबंधों के साथी के साथ मिलकर पति की इस कदर शातिराना और बेरहमी से हत्या करना, न केवल एक व्यक्ति के विश्वास को तोड़ना है, बल्कि यह पूरे सामाजिक भरोसे को तहस-नहस करने जैसा है।

न्यायालय ने इस सनसनीखेज मामले को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) मामलों की श्रेणी में मानते हुए दोनों दोषियों—मुस्कान और साहिल—के प्रति किसी भी तरह की नरमी बरतने से साफ इंकार कर दिया है।

“विदेश से सुखी सपनों के साथ लौटे पति को ठंडे दिमाग से काट कर ड्रम में सीमेंट से दफनाया”

फैसले की सुसंगत पंक्तियों में न्यायाधीश ने उस खौफनाक रात का जिक्र करते हुए लिखा कि विदेश से अपने परिवार के साथ देश में एक खुशहाल जीवन जीने के सपने लेकर लौटा पति, यह नहीं जानता था कि उसकी अपनी पत्नी ही उसकी कातिल बन जाएगी। उसे पहले ठंडे दिमाग से बेहोश किया गया, फिर बेरहमी से टुकड़ों में काटा गया और अंत में नीले ड्रम में भरकर ऊपर से सीमेंट से जाम कर दिया गया।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह वारदात अत्यंत बेरहम, वीभत्स, शैतानी, घिनौनी और कायरतापूर्ण है। हत्या के बाद शव को ठिकाने लगाने का यह शातिराना तरीका चौंकाने वाला और समाज की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला है। घटनास्थल पर कमरों की दीवारों और छतों पर बिखरे खून के छींटे इस जघन्य अपराध की पूरी क्रूरता की गवाही दे रहे थे।

दोषियों में जरा भी पश्चाताप नहीं, समाज और संतान के लिए खतरा

अदालत ने सुनवाई के दौरान दोनों आरोपियों के रवैये पर भी गंभीर नाराजगी जताई। जज ने अपने फैसले में लिखा कि सुनवाई की पूरी प्रक्रिया के दौरान न तो मुस्कान और न ही साहिल के चेहरे पर जरा भी पश्चाताप या अपराध-बोध (Remorse) का भाव दिखाई दिया।

हैरानी की बात यह रही कि साहिल ने अपने पिता से और मुस्कान ने अपनी ही पहली संतान से मिलने तक में कोई रुचि नहीं दिखाई। न्यायालय का मानना है कि आरोपियों का यह अवांछनीय और क्रूर आचरण इस बात का पुख्ता सबूत है कि वे भविष्य में भी समाज और बच्चों के लिए एक गंभीर खतरा बने रहेंगे। इसलिए उनके सुधार या समाज में पुनर्वास की कोई गुंजाइश नहीं है।

ऐतिहासिक फैसलों और दृष्टांतों का दिया हवाला

अपने इस फैसले को कानूनी मजबूती देने के लिए सत्र न्यायाधीश ने कई बड़े और चर्चित न्यायिक मामलों का हवाला दिया:

  • मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983): इस मामले के जरिए कोर्ट ने अपराध की क्रूरता की तुलना करते हुए ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ के सिद्धांत को रेखांकित किया।

  • राम सिंह बनाम सोहिनया (2007): अदालत ने स्पष्ट किया कि जब परिवार के किसी सदस्य की हत्या पूरी सुनियोजित साजिश के तहत, सोते समय और बिना किसी उकसावे के की जाए, तो यह साबित होता है कि अपराधियों में मानवीय संवेदनाएं पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं।

  • किरेन्दर सरकार बनाम असम राज्य (2009): इस बात पर जोर दिया गया कि एफआईआर (FIR) कोई ऐसा इनसाइक्लोपीडिया नहीं है जिसमें हर छोटी-छोटी बात विस्तार से दर्ज हो। साथ ही, स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति मात्र से मजबूत अभियोजन पक्ष को खारिज नहीं किया जा सकता।

  • आफताब अहमद अंसारी बनाम उत्तरांचल राज्य (2010): परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) वाले मामलों में जब आरोपी अपनी धारा 313 की गवाही के दौरान सच छिपाते हैं या नकारते हैं, तो वह उनके खिलाफ दोष सिद्ध करने की एक और मजबूत कड़ी बन जाती है।

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