
नई दिल्ली। तहलका पत्रिका के पूर्व एडिटर-इन-चीफ तरुण तेजपाल को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। गोवा के एक लग्जरी होटल में अपनी जूनियर महिला सहकर्मी के साथ दुष्कर्म के मामले में शीर्ष अदालत ने उनकी सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। तेजपाल ने बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से सुनाई गई 10 साल की कठोर कैद की सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग की थी।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने पीड़िता के बयान, ईमेल, व्हाट्सएप संदेश और अन्य साक्ष्यों पर विचार करने के बाद तेजपाल को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। इस फैसले से फिलहाल उन्हें सजा पर रोक के रूप में राहत नहीं मिल सकी है।
ट्रायल कोर्ट ने किया था बरी, हाईकोर्ट ने सुनाई 10 साल की सजा
यह मामला नवंबर 2013 में गोवा के एक पांच सितारा होटल की लिफ्ट में हुई घटना से जुड़ा है। तरुण तेजपाल पर अपनी जूनियर महिला सहकर्मी के साथ दुष्कर्म का आरोप लगा था।
मई 2021 में गोवा की सत्र अदालत ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। गोवा सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ में चुनौती दी थी।
इसके बाद 6 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया। हाईकोर्ट ने तेजपाल को दुष्कर्म समेत अन्य धाराओं में दोषी ठहराते हुए 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसी फैसले के खिलाफ तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
कपिल सिब्बल ने लिफ्ट की टाइमिंग और CCTV फुटेज पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट में तरुण तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। उन्होंने घटना के दौरान लिफ्ट के संचालन और उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों पर सवाल उठाए।
सिब्बल ने होटल और लिफ्ट निर्माता कंपनी मित्सुबिशी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दलील दी कि पीड़िता का यह दावा तकनीकी साक्ष्यों से मेल नहीं खाता कि घटना के दौरान लिफ्ट लगातार बंद रही थी। उनके मुताबिक, 2 मिनट 9 सेकंड के भीतर लिफ्ट दो बार खुली थी।
बचाव पक्ष ने जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। सिब्बल ने कहा कि जांच अधिकारी ने होटल के महत्वपूर्ण CCTV फुटेज जब्त नहीं किए। उनका तर्क था कि इन फुटेज से घटना की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती थी। इसके अलावा उन्होंने FIR दर्ज होने से पहले पीड़िता के बयानों में कथित विरोधाभास होने की दलील भी दी।
गोवा सरकार ने माफीनामे के ईमेल का दिया हवाला
गोवा सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तेजपाल की याचिका का विरोध किया। उन्होंने घटना के बाद तरुण तेजपाल की ओर से पीड़िता को भेजे गए माफीनामे वाले ईमेल और संदेशों को अदालत के सामने रखा।
इस पर कपिल सिब्बल ने दलील दी कि संबंधित ईमेल तत्कालीन एडिटर शोमा चौधरी के कहने पर तैयार कराया गया था। बचाव पक्ष के मुताबिक, इसे अपराध की स्वीकारोक्ति नहीं माना जाना चाहिए।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तरुण तेजपाल की सजा पर रोक लगाने की मांग खारिज कर दी। इस फैसले के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से सुनाई गई 10 साल की सजा पर फिलहाल रोक नहीं लगी है।

















