13 साल का ‘कोमा’, अब आखिरी विदाई: हरीश राणा के उस वायरल वीडियो ने झकझोर दिया देश का दिल

नई दिल्ली/गाजियाबाद: जिंदगी और मौत के बीच खिंची एक महीन लकीर पर 13 साल तक संघर्ष करने वाले गाजियाबाद के हरीश राणा अब अपने जीवन के अंतिम सफर पर हैं। यह कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन यह एक परिवार की अंतहीन पीड़ा और एक युवक की बेबसी की कड़वी सच्चाई है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद, दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में हरीश को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) की प्रक्रिया से गुजारा जा रहा है। डॉक्टरों की एक विशेष टीम की देखरेख में उनके जीवनरक्षक उपकरणों को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है।

एक हादसे ने छीन लीं 13 साल की खुशियां

हरीश राणा की जिंदगी साल 2011 में हमेशा के लिए बदल गई थी। उस वक्त वह चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे, तभी एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में वह हॉस्टल की इमारत से गिर गए। सिर में आई गंभीर चोट ने उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जिसे मेडिकल भाषा में ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ कहा जाता है। 13 साल तक हरीश बिस्तर पर अचेत पड़े रहे। न कोई हरकत, न कोई शब्द—बस मशीनों के शोर के बीच चलती सांसें। परिवार ने एक दशक से ज्यादा समय तक उम्मीद का दामन थामे रखा, लेकिन जब डॉक्टरों ने कह दिया कि अब चमत्कार की कोई गुंजाइश नहीं है, तब भारी मन से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया।

क्या है पैसिव यूथेनेशिया? कानून की नजर में ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’

भारत के कानून में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को कुछ विशेष परिस्थितियों में अनुमति दी गई है। इसका अर्थ है किसी असाध्य बीमारी से जूझ रहे मरीज को दी जा रही मेडिकल सहायता (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को रोक देना, ताकि मरीज की मृत्यु प्राकृतिक तरीके से हो सके।

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के मामले में मेडिकल रिपोर्ट को आधार बनाया, जिसमें स्पष्ट था कि उनका दिमाग पूरी तरह मृत प्राय हो चुका है और वह कभी सामान्य नहीं हो पाएंगे। अदालत ने माना कि किसी को मशीनों के सहारे अनंत काल तक पीड़ा में रखना उसकी मानवीय गरिमा के खिलाफ है।

सोशल मीडिया पर वायरल 22 सेकेंड का वो ‘विदाई’ वीडियो

इंटरनेट पर वायरल हो रहे एक छोटे से वीडियो ने लाखों लोगों का कलेजा चीर दिया है। वीडियो में हरीश बिस्तर पर लेटे हुए हैं और उनकी आंखें शून्य में ताक रही हैं। एक महिला (संभवतः उनकी माँ या परिजन) उनके माथे पर चंदन का तिलक लगा रही हैं। रुंधे हुए गले से वह कहती हैं, “सबको माफ करते हुए… सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ…” ये शब्द उस बेबसी को बयां कर रहे हैं, जो एक परिवार अपने प्रियजन को खोते समय महसूस करता है, लेकिन साथ ही उसे दर्द से मुक्त करने की तसल्ली भी इसमें छिपी है।

परिवार का बेमिसाल त्याग और कठिन फैसला

हरीश का परिवार पिछले 13 वर्षों से उनके लिए एक ढाल बना रहा। आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव के बावजूद उन्होंने हरीश की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन ‘इच्छा मृत्यु’ की मांग करना उनके लिए दुनिया का सबसे कठिन फैसला था। यह फैसला हार मानने का नहीं, बल्कि अपने बेटे को उस ‘पिंजरे’ से आजाद करने का था, जिसमें वह 13 साल से कैद था। हरीश की कहानी आज देश में लाइलाज बीमारियों और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर एक नई बहस छेड़ गई है।

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