इजराइल-अमेरिका से टकराव के बीच ईरान की रणनीति ने चौंकाया, सैन्य तैयारियों ने बढ़ाई दुनिया की चिंता

तेहरान/वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया (Middle East) के रणमैदान में इस समय जो कुछ भी हो रहा है, उसने दुनिया भर के सैन्य विशेषज्ञों और ‘सुपरपावर्स’ के होश उड़ा दिए हैं। अब तक माना जाता था कि जिसके पास पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स और आधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं, वही जंग का असली सिकंदर है। लेकिन ईरान ने अमेरिका और इजराइल के इस घमंड को चकनाचूर कर दिया है। रणनीतिकारों का अनुमान था कि अमेरिकी हमलों के बाद ईरान सरेंडर कर देगा, मगर ईरान की ‘लो-कॉस्ट वॉरफेयर’ (Low-Cost Warfare) तकनीक ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।

महंगे F-35 और पैट्रियट पर भारी पड़े ईरान के ‘सस्ते’ ड्रोन्स

इस जंग की सबसे बड़ी सीख यह है कि युद्ध अब केवल विनाशक हथियारों से नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट रणनीति’ से जीता जाता है। अमेरिका के पास F-35 और F-22 जैसे आधुनिक जेट, पैट्रियट और थाड (THAAD) जैसे मिसाइल डिफेंस सिस्टम और B-2 बॉम्बर जैसे घातक हथियार हैं। लेकिन ईरान ने एक ऐसी चाल चली जिससे ये अरबों डॉलर के सिस्टम बोझ बन गए। ईरान ने जंग में बेहद सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों की बारिश कर दी। एक ड्रोन की कीमत जहां कुछ हजार डॉलर थी, वहीं उसे गिराने वाली अमेरिकी मिसाइल की कीमत करोड़ों में थी।

आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका को मात: मिसाइलों का स्टॉक खत्म होने की कगार पर

ईरान ने इजराइल और मिडिल ईस्ट में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर इतने ड्रोन्स दागे कि अमेरिका को अपने डिफेंस सिस्टम का व्यापक इस्तेमाल करना पड़ा। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और इजराइल के पास अब डिफेंस के लिए मिसाइलों का स्टॉक खतरनाक स्तर तक कम हो गया है। जानकारों का कहना है कि $5,000 के ड्रोन को मारने के लिए $20 लाख की मिसाइल दागना किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकता है। यूक्रेन-रूस युद्ध में भी यही देखने को मिला था, जहां सस्ते ड्रोन्स ने रूस को भारी नुकसान पहुंचाया।

S-400 जैसे सिस्टम पर उठ रहे सवाल: क्या हर खतरे पर वार करना समझदारी है?

सामरिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि S-400 जैसे बेहद आधुनिक और महंगे डिफेंस सिस्टम से हर छोटे हवाई खतरे या ड्रोन पर वार करना समझदारी नहीं है। S-400 दुनिया का सबसे आधुनिक सिस्टम है जो 400 किमी दूर से फाइटर जेट्स और बैलिस्टिक मिसाइलों को तबाह करने के लिए बना है। यदि इसे छोटे ड्रोन्स पर खर्च कर दिया गया, तो मुख्य हमले के समय देश निहत्था हो सकता है। यह स्थिति भारत जैसे देशों के लिए भी एक बड़ी चेतावनी है, जो अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए इन महंगे सिस्टम पर निर्भर हैं।

भारत के लिए बड़ी सीख: ‘क्वांटिटी’ भी है ‘क्वालिटी’ जितनी जरूरी

ईरान की इस रणनीति ने साबित कर दिया है कि भविष्य के युद्धों में केवल तकनीक नहीं, बल्कि हथियारों की संख्या (Quantity) और उनकी लागत (Cost-efficiency) भी मायने रखेगी। भारत को भी अब अपने डिफेंस पोर्टफोलियो में एंटी-ड्रोन तकनीक और कम लागत वाली मिसाइल प्रणालियों को प्राथमिकता देनी होगी। यह जंग दिखा रही है कि कैसे एक कम ताकतवर देश भी सही रणनीति के दम पर दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के पसीने छुड़ा सकता है।

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