
लेखक: उपेन्द्र नाथ शर्मा, पार्टनर, जेएसए।
जीएसटी प्रणाली ने कराधान को सरल और पारदर्शी बनाया है, जिससे कर संग्रह में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। हालांकि, जीएसटी दरों की मौजूदा संरचना में जटिलता बनी हुई है, क्योंकि इसमें कई कर स्लैब शामिल हैं। इस वजह से इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स लंबे समय से कर स्लैब को कम करने की मांग कर रहे हैं, ताकि अनुपालन और प्रशासन को आसान बनाया जा सके।
लेकिन मंत्रिसमूह (जीओएम) द्वारा तंबाकू उत्पादों और एयरेटेड पेय पदार्थों पर 35% कर दर के साथ एक नया स्लैब जोड़ने की सिफारिश जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाने के प्रयासों के विपरीत है। इससे कर स्लैब और जटिल हो जाएंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जीओएम अन्य वस्तुओं, जैसे रेडीमेड वस्त्र, हैंडबैग और घड़ियों जैसी विलासिता की वस्तुओं पर भी कर स्लैब बढ़ाने पर विचार कर रहा है। ऐसे समय में, जब खपत और मांग पहले से ही दबाव में हैं, जीएसटी दरों में संभावित वृद्धि से आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। महंगाई और घटती मांग के बीच, जीएसटी दरों को बढ़ाना व्यावहारिक नहीं लगता, क्योंकि इससे न केवल उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, बल्कि बाजार की मांग में और गिरावट आने की संभावना भी बढ़ जाएगी।
जीएसटी में प्रस्तावित बढ़त का प्रभाव
एयरेटेड पेय पदार्थ
शुगर-आधारित मीठे पेय पदार्थों पर विश्व बैंक के अध्ययन के मुताबिक, भारत में कार्बोनेटेड शीतल पेय पदार्थों पर 2023 तक 40% टैक्स लगता है, जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा है। दूसरी तरफ, यूके और फ्रांस जैसे देशों ने इन पर शुगर के स्तर के हिसाब से टैक्स तय किया है। ज्यादा शुगर वाले उत्पादों पर ज्यादा टैक्स और कम शुगर वाले उत्पादों पर कम टैक्स का नियम है। भारत में भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, और उपभोक्ता कम शुगर वाले उत्पादों की ओर रुख कर रहे हैं। लेकिन यहां शुगर वाले सभी पेय पदार्थों पर समान उच्च टैक्स लगाने से उत्पादकों को कम शुगर वाले विकल्प विकसित करने के लिए प्रेरणा नहीं मिलती।
अगर टैक्स व्यवस्था को सुधार कर बहुस्तरीय कर प्रणाली अपनाई जाए, तो यह उत्पादकों को इनोवेशन के लिए प्रोत्साहित करेगी। इससे न केवल नए उत्पादों का निर्माण होगा, बल्कि नौकरियां भी बढ़ेंगी और सरकार को ज्यादा राजस्व मिलेगा। साथ ही, उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यवर्धक विकल्प भी मिलेंगे।
सिगरेट
सिगरेट की बात करें तो, प्रस्तावित 35% टैक्स स्लैब उपभोक्ताओं पर भारी पड़ सकता है। महंगाई और कम होती डिस्पोजेबल आय के कारण, उपभोक्ता सस्ते या तस्करी से आई सिगरेटों की ओर रुख कर सकते हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, भारत में पहले से ही सिगरेट की कीमतें आय स्तर के मुकाबले बहुत ज्यादा हैं। अगर टैक्स और बढ़ा दिया गया, तो यह कानूनी सिगरेट उद्योग को नुकसान पहुंचाएगा और अवैध सिगरेट व्यापार को बढ़ावा देगा। इस तरह के अवैध उत्पाद सस्ते होने के कारण बिना किसी गुणवत्ता जांच के बाजार में आ सकते हैं और नाबालिगों तक भी पहुंच सकते हैं। इससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ेंगी और सरकार को राजस्व का नुकसान होगा। इसलिए, टैक्स नीति को सावधानीपूर्वक तैयार करना जरूरी है ताकि यह उद्योग, उपभोक्ता और सरकार के हितों के बीच संतुलन बनाए रखे।
अंतरराष्ट्रीय शोध एजेंसी यूरोमॉनीटर के अनुसार, भारत अब दुनिया का चौथा सबसे बड़ा अवैध सिगरेट बाजार बन चुका है। यह अवैध सिगरेट बाजार भारतीय सिगरेट बाजार का 26.1% हिस्सा है, जो वैध सिगरेट का लगभग एक तिहाई है। अगर कर दरें और बढ़ाई गईं, तो अवैध सिगरेट का यह व्यापार और तेजी से बढ़ सकता है।
अवैध व्यापार को नियंत्रित करने के लिए सरकार को एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। इसमें कर की दरों में स्थिरता बनाए रखने और सख्त प्रवर्तन प्रणाली लागू करने पर ध्यान देना होगा। कर की दर बढ़ाने से अवैध कारोबारियों को और ज्यादा लाभ कमाने का मौका मिलेगा, जिससे वैध व्यापार को नुकसान होगा और सरकार का राजस्व भी प्रभावित होगा।
ग्रोथ और महंगाई में संतुलन
मौजूदा आर्थिक माहौल में सरकार के लिए विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए कम कर दरें और मजबूत प्रवर्तन प्रणाली को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि व्यवसाय और उपभोक्ता, दोनों पर अनावश्यक दबाव न पड़े। जीएसटी काउंसिल को अपने फैसलों में उपभोक्ता और व्यवसायों की आवश्यकताओं को केंद्र में रखना चाहिए, जिससे राजस्व वृद्धि के साथ-साथ आर्थिक स्थिरता भी सुनिश्चित हो सके।














