भारत का मास्टरस्ट्रोक: चेनाब पर इन चार प्रमुख हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को तेज़ करने के निर्देश…अब बिन पानी तरस जाएगा PAK

जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों में अब सिर्फ बिजली परियोजनाएं नहीं बन रहीं, बल्कि एक बड़ा भू-राजनीतिक संदेश भी आकार ले रहा है. केंद्र सरकार ने चेनाब नदी प्रणाली पर चार प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं को फास्ट-ट्रैक करने के निर्देश देकर यह साफ कर दिया है कि अब देरी का दौर खत्म हो चुका है. यह कदम सिर्फ विकास से जुड़ा नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों की जटिल जल-राजनीति से भी गहराई से जुड़ा है.

ऊर्जा मंत्री मनोजर लाल खट्टर की हालिया दो दिवसीय जमीनी समीक्षा के बाद अधिकारियों को सख्त समयसीमा थमा दी गई है. पाकल डुल और किरण (किरू) परियोजनाओं को दिसंबर 2026 तक, क्वार को मार्च 2028 तक और रैटल परियोजना को तेज़ी से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया है. संदेश स्पष्ट है कि अब प्रोजेक्ट्स कागज़ों में नहीं, ज़मीन पर दिखने चाहिए. 

बिजली से आगे की कहानी

चेनाब नदी सिंधु बेसिन का अहम हिस्सा है, जिस पर पाकिस्तान की कृषि और जल-व्यवस्था भारी निर्भर करती है. पाकिस्तान की खेती का बड़ा हिस्सा और उसकी जलविद्युत संरचना इसी बेसिन से आने वाले पानी पर टिकी है. ऐसे में भारत की ओर से चेनाब पर हर कदम इस्लामाबाद में चिंता के साथ देखा जाता है. 

पाकल डुल: गेम बदलने वाली परियोजना

किश्तवाड़ में स्थित 1000 मेगावाट की पाकल डुल परियोजना इस पूरी रणनीति की धुरी मानी जा रही है. 167 मीटर ऊंचा यह बांध न सिर्फ चेनाब बेसिन का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है, बल्कि पश्चिमी नदियों पर भारत की पहली स्टोरेज क्षमता भी देता है. 2018 में नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित यह परियोजना अब भारत को जल प्रवाह के समय को नियंत्रित करने की वास्तविक क्षमता दे सकती है. 

किरण और क्वार: चेन की कड़ियां

किरण और क्वार परियोजनाएं भले ही रन-ऑफ-द-रिवर मॉडल पर हों, लेकिन इनका महत्व श्रृंखलाबद्ध ढांचे में है. ऊपर और नीचे बने इन बांधों से जल प्रवाह का बेहतर प्रबंधन संभव होता है. जनवरी 2024 में क्वार के लिए चेनाब का डायवर्जन पाकिस्तान में खास तौर पर नोटिस किया गया था, जो बताता है कि ये तकनीकी फैसले भी राजनीतिक संकेत बन जाते हैं.

रैटल: सबसे विवादास्पद मोर्चा

850 मेगावाट की रैटल परियोजना वर्षों से भारत-पाकिस्तान विवाद का केंद्र रही है, खासकर इसके स्पिलवे डिज़ाइन को लेकर. अब इसके कंक्रीटिंग कार्य की शुरुआत और 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य यह दिखाता है कि भारत पीछे हटने के मूड में नहीं है. 2024 में नदी का टनल डायवर्जन इस बात का संकेत था कि प्रोजेक्ट अब निर्णायक चरण में है. 

संधि की छाया में आत्मनिर्भरता

इंडस वाटर ट्रीटी के भविष्य पर अनिश्चितता के बीच भारत इन परियोजनाओं को अपनी वैध सीमाओं के भीतर आगे बढ़ा रहा है. दिल्ली का तर्क साफ है कि ये परियोजनाएं संधि के दायरे में हैं और देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी हैं. पाकिस्तान की आपत्तियों को भारत लगातार खारिज करता रहा है.

पानी, पावर और पॉलिटिक्स

चेनाब पर तेज़ होती परियोजनाएं दिखाती हैं कि भारत अब जल संसाधनों को सिर्फ प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि रणनीतिक ताकत के रूप में देख रहा है. बिजली उत्पादन एक पहलू है, लेकिन जल प्रवाह के समय और प्रबंधन पर नियंत्रण भविष्य की कूटनीति में बड़ा हथियार बन सकता है. यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों में बन रहे ये बांध, दरअसल दक्षिण एशिया की राजनीति में दूर तक असर डालने वाले हैं.

खबरें और भी हैं...

Leave a Comment