
बेंगलुरु। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बुधवार को अपने महत्वपूर्ण उपग्रह एनवीएस-02 (NVS-02) के ऑर्बिट-रेजिंग के दौरान आई तकनीकी खराबी की विस्तृत रिपोर्ट जारी कर दी है। इसरो द्वारा गठित शिखर समिति (Apex Committee) ने इस विफलता की तह तक जाकर उन कारणों की पहचान की है, जिसकी वजह से सैटेलाइट अपनी तय कक्षा तक नहीं पहुँच सका था। इस रिपोर्ट के साथ ही इसरो ने भविष्य के मिशनों को पूरी तरह सुरक्षित और सफल बनाने के लिए नए सुधारात्मक उपायों की घोषणा भी की है।
क्या हुआ था 29 जनवरी 2025 को?
बता दें कि 29 जनवरी 2025 को जीएसएलवी-एफ15 (GSLV-F15) के जरिए एनवीएस-02 उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा गया था। रॉकेट ने उपग्रह को उसकी प्रारंभिक कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया था और सोलर पैनल भी खुल गए थे। लेकिन, असली समस्या तब आई जब उपग्रह को अंडाकार (Elliptical) कक्षा से ऊपर उठाकर गोलाकार (Circular) कक्षा में ले जाने की प्रक्रिया शुरू की गई। इस चरण में आई बाधा के कारण मिशन अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका।
एपेक्स कमेटी का खुलासा: ‘पायरो वाल्व’ तक नहीं पहुँचा सिग्नल
विफलता की जांच के लिए बनाई गई एपेक्स कमेटी ने टेलीमेट्री और सिमुलेशन डेटा का गहन अध्ययन किया। जांच में सामने आया कि गड़बड़ी का मुख्य कारण ड्राइव सिग्नल का ऑक्सीडाइज़र लाइन के ‘पायरो वाल्व’ तक न पहुँच पाना था। दरअसल, यह सिग्नल ही इंजन को वह ताकत देता था जिससे उपग्रह अपनी कक्षा बढ़ा सके। रिपोर्ट के मुताबिक, मेन और रिडंडेंट कनेक्टर पाथ में कम से कम एक कॉन्टैक्ट के अलग होने (Disconnect) की वजह से यह तकनीकी चूक हुई, जिसने पूरे मिशन की गति रोक दी।
CMS-03 मिशन में दिखा सुधार का असर
इसरो ने केवल विफलता के कारणों को ही नहीं खोजा, बल्कि तुरंत सुधारात्मक कदम भी उठाए। कमेटी ने पायरो सिस्टम की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए जो सिफारिशें की थीं, उन्हें 2 नवंबर 2025 को लॉन्च किए गए सीएमएस-03 (CMS-03) स्पेसक्राफ्ट में लागू किया गया। परिणाम सुखद रहे—एलवीएम-3 एम5 रॉकेट के जरिए भेजे गए इस सैटेलाइट ने अंतरिक्ष में बेहतरीन प्रदर्शन किया और सफलतापूर्वक अपनी निर्धारित कक्षा में पहुँच गया।
भविष्य के मिशनों के लिए नई रणनीति
इसरो ने स्पष्ट किया है कि एनवीएस-02 की जांच से मिले सबक अब संगठन के लिए मार्गदर्शक का काम करेंगे। आगे के सभी अंतरिक्ष मिशनों में पायरो सिस्टम ऑपरेशन की रिडंडेंसी (Redundancy) को और मजबूत किया जाएगा ताकि किसी भी सिग्नल फेलियर की स्थिति में वैकल्पिक मार्ग सक्रिय हो सकें। इसरो का यह पारदर्शी रवैया और सुधार की गति अंतरिक्ष जगत में भारत के बढ़ते कदमों को और मजबूती प्रदान करेगी।














