
नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी भीषण जंग अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रही है। इसका सीधा असर भारतीय रसोई के बजट और सप्लाई चेन पर पड़ना शुरू हो गया है। ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर तनाव के कारण भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भारत अपनी जरूरत की अधिकांश एलपीजी (LPG) और नेचुरल गैस आयात करता है। ऐसे में यदि सप्लाई बाधित होती है, तो देश में गैस की भारी किल्लत हो सकती है।
इस संभावित संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने एक ‘इमरजेंसी रिस्पांस प्लान’ तैयार किया है। इस प्लान के तहत यह तय कर लिया गया है कि संसाधनों की कमी होने पर गैस का वितरण किस प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा।
सरकार की प्रायोरिटी लिस्ट: पहले चूल्हा, फिर व्यापार
गैस संकट की स्थिति में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका मंत्र ‘पहले जीवन और जरूरत, फिर व्यापार’ होगा। वितरण की प्राथमिकता सूची कुछ इस प्रकार है:
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आम नागरिक और उज्ज्वला लाभार्थी: सरकार की लिस्ट में सबसे ऊपर घरेलू उपभोक्ता हैं। विशेष रूप से ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के लाभार्थियों को सबसे पहले सिलेंडर दिए जाएंगे ताकि गरीब परिवारों का चूल्हा जलता रहे।
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अस्पताल और मेडिकल सेक्टर: स्वास्थ्य सेवाओं को ‘अनइंटरप्टेड’ यानी निर्बाध श्रेणी में रखा गया है। अस्पतालों में नसबंदी और अन्य चिकित्सा कार्यों के लिए गैस की सप्लाई को प्राथमिकता दी जाएगी।
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देश की सुरक्षा (सामरिक क्षेत्र): सीमाओं पर तैनात जवानों और सैन्य मेस के लिए ईंधन का एक विशेष कोटा सुरक्षित रखा जाएगा। सामरिक सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा।
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सामुदायिक रसोई: सरकारी कैंटीन और वे सामुदायिक रसोई जो बड़ी आबादी को भोजन उपलब्ध कराती हैं, उन्हें भी वरीयता श्रेणी में रखा गया है।
इन पर लग सकती है सप्लाई की पाबंदी
जब संसाधनों की भारी कमी होगी, तो सरकार का कड़ा रुख कमर्शियल और इंडस्ट्रियल सेक्टर की ओर रहेगा।
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बड़े होटल्स: व्यावसायिक लाभ के लिए गैस का इस्तेमाल करने वाले बड़े होटलों को वैकल्पिक ईंधन (जैसे बिजली या सोलर) की ओर रुख करने का निर्देश दिया जा सकता है।
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फैक्ट्रियां: ऐसी औद्योगिक इकाइयां जहां एलपीजी का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है, उनकी सप्लाई में कटौती की जा सकती है ताकि ‘प्रॉफिट’ से पहले ‘पब्लिक’ की बुनियादी जरूरतें पूरी की जा सकें।














