पंचायत चुनाव 2026 पर सस्पेंस: क्या 2027 में विधानसभा संग होगा महाचुनावी संग्राम?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति में अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। साल 2026 में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव अब प्रशासनिक पेच और राजनीतिक गणित के कारण 2027 तक टल सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो प्रदेश में एक दुर्लभ नजारा देखने को मिलेगा, जहां गांव की सरकार और प्रदेश की सरकार चुनने के लिए मतदान एक साथ या बेहद कम अंतराल पर कराया जा सकता है। इस खबर ने उन दावेदारों की नींद उड़ा दी है, जो पिछले कई महीनों से क्षेत्र में सक्रिय थे।

OBC आयोग का पुनर्गठन बना बड़ी बाधा

पंचायत चुनावों पर ‘ब्रेक’ लगने की सबसे बड़ी वजह तकनीकी और कानूनी है। उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग (OBC Commission) का मूल कार्यकाल अक्टूबर 2025 में ही समाप्त हो चुका है। हालांकि, सरकार ने इसे विस्तार दिया था, लेकिन हाईकोर्ट में दायर याचिका के बाद स्थिति बदल गई है। अब सरकार को सुप्रीम कोर्ट के ‘ट्रिपल टेस्ट’ फॉर्मूले के तहत एक नया समर्पित आयोग गठित करना होगा। यह आयोग पूरे प्रदेश में ‘रैपिड सर्वे’ कर पिछड़ों की वास्तविक आबादी का डेटा जुटाएगा, जिसके आधार पर ही नई आरक्षण सूची तैयार होगी। जानकारों की मानें तो इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम 6 महीने का वक्त लग सकता है, जिससे 2026 की समय सीमा का पालन करना नामुमकिन नजर आ रहा है।

2027 का मास्टर प्लान: बीजेपी की रणनीति?

सियासी गलियारों में चर्चा है कि चुनाव टलने के पीछे केवल प्रशासनिक कारण ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल की गहरी रणनीति भी है। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक पहले पंचायत चुनाव कराना जोखिम भरा हो सकता है। ग्रामीण इलाकों में स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की आपसी गुटबाजी का खामियाजा पार्टी को विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। ऐसे में रणनीति यह बन रही है कि पहले विधानसभा चुनाव की अग्निपरीक्षा पार की जाए और उसके बाद ही पंचायत चुनाव की बिसात बिछाई जाए।

अखिलेश की ‘साइकिल’ पर सवार होंगे दो दिग्गज चेहरे

एक तरफ जहां पंचायत चुनावों पर अनिश्चितता के बादल हैं, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) ने 2027 के महासंग्राम के लिए अपनी सोशल इंजीनियरिंग तेज कर दी है। अखिलेश यादव दो ऐसे चेहरों को पार्टी में शामिल करने जा रहे हैं, जो मुस्लिम और ओबीसी वोटों के समीकरण को बदल सकते हैं:

  • नसीमुद्दीन सिद्दीकी: बसपा के पूर्व नंबर-2 और कांग्रेस नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी 15 फरवरी को लखनऊ में आधिकारिक रूप से ‘साइकिल’ थाम सकते हैं। पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड में उनका मजबूत आधार सपा के लिए संजीवनी साबित हो सकता है।
  • अनीस अहमद उर्फ ‘फूल बाबू’: पीलीभीत के बीसलपुर से कई बार विधायक और पूर्व मंत्री रहे फूल बाबू भी अपने समर्थकों के साथ सपा की सदस्यता लेंगे। तराई के बेल्ट में उनकी पकड़ अखिलेश के कुनबे को मजबूती देगी।

प्रशासकों के हाथ में जा सकती है कमान

यदि चुनाव समय पर नहीं होते हैं, तो वर्तमान ग्राम प्रधानों, ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल समाप्त होते ही वहां ‘रिसीवर’ यानी प्रशासकों की नियुक्ति की जा सकती है। इससे विकास कार्यों की गति और स्थानीय राजनीति पर सीधा असर पड़ने की संभावना है। फिलहाल, सभी की निगाहें सरकार के अगले कदम और ओबीसी आयोग के गठन पर टिकी हैं। 

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