जनाधार ने मुलायम को बनाया चौ. चरण सिंह की राजनीतिक विरासत का वारिस

लखनऊ। किसान पुत्र के घर सैफई में जन्मे मुलायम सिंह यादव ‘नेताजी’ ने बड़ा राजनीतिक संघर्ष किया। उन्हें पहली बार जसवंत नगर सीट से 1967 में टिकट मिला और वह जीत कर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर कभी नहीं थमा और आगे बढ़ते गए। हालांकि 1969 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस के विशंभर सिंह यादव विधायक बने, लेकिन इसके बाद भी मुलायम सिंह यादव का सियासी काफिला कभी नहीं थमा और आगे बढ़ता गया।

इस दौर में जय प्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सरकार को हटाने के लिए संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। मुलायम सिंह यादव शहर-शहर, गांव-गांव कांग्रेस सरकार के खिलाफ लोगों को एकजुट करने लगे। 1974 के चुनाव में बीकेडी के टिकट पर मैदान में उतरे मुलायम सिंह यादव ने विशंभर सिंह को पटखनी दे दी। 26 जून 1975 को जब देश में आपातकाल लगा तो अगले ही दिन मुलायम भी गिरफ्तार हो गये। मुलायम ने पूरे 19 महीने इटावा की जेल में काटे। आपातकाल के हटते ही देश में चुनाव हुए। विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी बनाई। वहीं 1977 में मुलायम भारतीय लोक दल के टिकट पर लगातार दो बार विधानसभा पहुंचे। 10 साल की राजनीति के बाद जनता पार्टी की सरकार में मुलायम मंत्री बने। मुलायम को सहकारिता, पशु पालन और ग्राम उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई।

जनाधार ने मुलायम को बनाया चौ0 चरण सिंह की राजनीतिक विरासत का वारिस

अजीत सिंह विदेश से पढ़ाई करके लौटे और पिता चौधरी चरण सिंह की राजनीति विरासत को संभालने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन मुलायम का दावा ज्यादा मजबूत था। अजीत भले ही चरण सिंह की राजनीति के वारिस थे, पर जनाधार के वारिस मुलायम ही बने। चरण सिंह की मौत के साथ ही लोकदल पार्टी टूट गई। अजीत सिंह लोकदल की कमान अपने हाथ में रखना चाहते थे। उनका आरोप था कि मुलायम पार्टी में मनमाने फैसले लेते हैं। आखिरकार अजीत सिंह और कांग्रेस के नेताओं के बीच में मुलायम के हाथ से विपक्ष के नेता की कुर्सी निकल गई।

मुलायम ने मौका गंवाया नहीं और बने पहली बार मुख्यमंत्री

लेफ्ट और चंद्रशेखर की जनता पार्टी सहित सात दलों को मिलाकर क्रांति मोर्चा बनाया। एक मिनी वैन को क्रांति रथ का रूप दिया और यूपी के दौरे पर निकल गये। यात्रा के आखिरी दिन लखनऊ में बड़ी रैली की। चंद्रशेखर, हेमवती नंदन बहुगुणा, हरकिशन सिंह सुरजीत, रामकृष्ण हेगड़े जैसे बड़े-बड़े विपक्षी नेता इस रैली में आए और यहीं से पहली बार मुलायम के मुख्यमंत्री बनने की नींव पड़ी।

सियासत में रमे मुलायम लखनऊ में ज्यादा समय बिताते

मुलायल सिंह यादव ज्यादातर वक्त लखनऊ में बिताते थे। परिवार के लिए वक्त कम रहता। मुलायम के विधानसभा इलाकों की जिम्मेदारी भाई शिवपाल यादव पर रहती। लखनऊ से सैफई तक समाजवादियों का एक नारा अक्सर सुनाई देने लगा था कि जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है। इसके पीछे राजनीति की वह माहिर चाल है, जिसे चलने में मुलायम सिंह खूब माहिर हैं। उनका राजनीतिक सफर देश की राजनीति में हमेशा याद किया जाता रहेगा।

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