शर्मनाक नाम का दंश झेल रहा यूपी का यह गांव, लड़कियों की नहीं हो रही शादी, पढ़ें हैरान करने वाली कहानी

Tawaif Village: उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में एक ऐसा गांव है, जिसका नाम यहां के निवासियों के लिए अभिशाप बन गया है. ‘रूपवार तवायफ’ नाम का यह कलंक आज भी लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है, आलम यह है कि इस नाम की वजह से गांव की बेटियों के रिश्ते टूट जाते हैं और युवाओं को शहरों में नौकरी ढूंढने से लेकर होटल में कमरा लेने तक में शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है. अब ग्रामीण इस नाम से छुटकारा पाने के लिए प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं.

अंग्रेजों के जमाने का कलंक

विलियम शेक्सपियर ने भले ही कहा हो कि ‘नाम में क्या रखा है?’, लेकिन बलिया का यह गांव इस कहावत को झुठलाता नजर आता है. अंग्रेजों के शासनकाल में इस गांव को शाही महफिलों और मनोरंजन के लिए बसाया गया था, जहां करीब 400 तवायफों को रखा गया था. उस दौर में यह गांव संगीत, गजल और नृत्य का केंद्र हुआ करता था, लेकिन देश आजाद होने और अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी यह नाम सरकारी दस्तावेजों में दर्ज रह गया और आज तक यहां के लोगों के लिए नासूर बना हुआ है.

बेटियों की जिंदगी पर सबसे बुरा असर

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि इस नाम का सबसे बुरा असर बेटियों की जिंदगी पर पड़ रहा है. कई बार लड़कियों की शादी तय हो जाती है, लेकिन जैसे ही लड़के वालों को गांव के नाम का पता चलता है, वे रिश्ता तोड़ देते हैं. यह दर्दनाक हकीकत गांव के हर परिवार को परेशान कर रही है. गांव की महिलाएं अपना पता बताने में हिचकिचाती हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि लोग उनके चरित्र पर सवाल उठाएंगे.

युवा पीढ़ी झेल रही शर्मिंदगी

गांव की युवा पीढ़ी भी इस कलंक से अछूती नहीं है. शहर में नौकरी करने वाले युवा जब अपना पता बताते हैं तो लोग उनका मजाक उड़ाते हैं. कई युवाओं ने बताया कि जब वे होटल में कमरा लेने जाते हैं तो रिसेप्शनिस्ट उनके आईडी कार्ड पर गांव का नाम देखकर हंसते हैं. इस शर्मिंदगी से बचने के लिए कई युवा अपने पते में शहर का नाम लिखवा देते हैं.

“देवपुर” नाम की उठी मांग

अब गांव के लोग इस शर्मनाक पहचान से मुक्ति चाहते हैं. ग्रामीणों ने एकजुट होकर गांव का नाम बदलकर “देवपुर” रखने की मांग की है. पिछले दो सालों से ग्रामीण लगातार प्रशासन और सरकार को पत्र लिखकर गुहार लगा रहे हैं. उनका कहना है कि जब बड़े-बड़े शहरों के नाम बदले जा सकते हैं तो उनके गांव का क्यों नहीं? वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियों को इस कलंक के साथ न जीना पड़े और उन्हें समाज में सम्मान की नजर से देखा जाए.

खबरें और भी हैं...

Leave a Comment

58 − 56 =
Powered by MathCaptcha