
उत्तर प्रदेश की ‘शो-विंडो’ माने जाने वाले नोएडा के सेक्टर-150 में 27 वर्षीय इंजीनियर युवराज मेहता की मौत ने सरकारी तंत्र और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शुक्रवार रात गुरुग्राम से घर लौटते समय जिस कार में युवराज सवार थे, उसे नाले से बाहर निकालने में प्रशासन को करीब चार दिन (लगभग 90 घंटे) लग गए। यह कार अब केवल एक वाहन नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही और कुव्यवस्था का प्रतीक बन गई है।
मंगलवार को एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों ने नाले से ग्रे रंग की ग्रैंड विटारा कार बाहर निकाली। मौके पर मौजूद लोगों की आंखें नम थीं। बताया गया कि हादसे के बाद युवराज करीब दो घंटे तक कार के ऊपर खड़े होकर टॉर्च जलाकर मदद की गुहार लगाते रहे। घटनास्थल पर पुलिस, दमकल और राहत विभाग के करीब 80 कर्मी मौजूद थे, लेकिन किसी ने भी पानी में उतरकर तत्काल रेस्क्यू शुरू नहीं किया।

“अगर समय पर रेस्क्यू होता…”
मृतक के पिता राजकुमार मेहता का कहना है कि यदि मौके पर तैराक और बोट उपलब्ध होती, तो शायद उनके बेटे की जान बचाई जा सकती थी। उन्होंने सवाल उठाया कि जब टीम के पास जरूरी संसाधन नहीं थे, तो उन्हें वहां भेजा ही क्यों गया। परिवार का आरोप है कि दो घंटे तक युवराज मदद मांगता रहा, लेकिन रेस्क्यू में देरी जानलेवा साबित हुई।
20 दिन पहले भी दिखा था खतरा
इस हादसे को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इसे रोका जा सकता था? रिपोर्ट के मुताबिक 31 दिसंबर को इसी एल-शेप मोड़ पर धुंध के कारण एक ट्रक नाले की दीवार से टकराकर लटक गया था। उस वक्त चालक की जान बच गई थी और प्रशासन ने केवल क्रेन से ट्रक हटवाकर मामले को खत्म मान लिया। न तो बैरिकेड लगाए गए, न चेतावनी बोर्ड और न ही अन्य सुरक्षा इंतजाम। यदि तब ठोस कदम उठाए जाते, तो संभव है कि युवराज की मौत टल जाती।
हादसे के बाद अब उस मोड़ पर सीमेंट के रोड ब्लॉकर, बैरिकेड और रस्सियां लगाई गई हैं, लेकिन बाकी हिस्सों में खतरा अब भी बरकरार बताया जा रहा है।
चार दिन बाद पहुंचे अफसर और जनप्रतिनिधि
घटना के चार दिन बाद गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम मौके पर पहुंचीं। मीडिया के सवालों पर उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। सांसद महेश शर्मा और क्षेत्रीय विधायक तेजपाल नागर भी चार दिन बाद घटनास्थल पहुंचे और कार्रवाई का आश्वासन दिया। सवाल यह उठ रहा है कि करोड़ों के फ्लैटों वाले इस इलाके में बुनियादी सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं थे।
बिल्डर गिरफ्तार, SIT जांच में जुटी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त रुख के बाद नोएडा अथॉरिटी के सीईओ को पद से हटा दिया गया है। मामले में मुख्य आरोपी एमजेड विशटाउन के मालिक अभय कुमार को हरियाणा के पलवल से गिरफ्तार कर एक दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।
एडीजी भानु भास्कर के नेतृत्व में गठित विशेष जांच टीम (SIT) ने घटनास्थल का निरीक्षण किया है। SIT तीन अहम सवालों के जवाब तलाशेगी—
- जब मौके पर करीब 80 अधिकारी मौजूद थे, तो दो घंटे तक रेस्क्यू क्यों नहीं शुरू हुआ?
- छह साल से नाला और गड्ढा खुला क्यों छोड़ा गया?
- 31 दिसंबर के हादसे के बाद भी सुरक्षा उपाय क्यों नहीं किए गए?
चश्मदीद के बदले बयान पर सवाल
मामले में चश्मदीद मनिंदर के बयान बदलने से भी विवाद गहरा गया है। शुरुआत में उन्होंने कहा था कि पुलिस और रेस्क्यू टीमें दो घंटे तक पानी में नहीं उतरीं। बाद में उन्होंने दावा किया कि घना कोहरा और अंधेरा होने के कारण युवराज नजर नहीं आ रहा था। आरोप है कि पुलिस ने उन्हें कई घंटे थाने में बैठाकर रखा, जिससे बयान बदलने का दबाव बनाए जाने की आशंका जताई जा रही है।
पहले भी हो चुके हैं ऐसे हादसे
यह पहला मामला नहीं है। मार्च में ग्रेटर नोएडा के पी-4 सेक्टर में एक कार नाले में गिरने से स्टेशन मास्टर की मौत हो गई थी। उस हादसे के बाद प्रशासन ने सुरक्षा इंतजाम किए थे। सवाल यह है कि क्या हर बार किसी की जान जाने के बाद ही सिस्टम जागेगा, या भविष्य में ऐसी लापरवाही पर समय रहते रोक लगेगी?










