
हाल में पेरिस के फ्रेंच ओपन से एक तस्वीर आई, जिसमें महिला खिलाड़ी आंखें मींची हुई हैं और कुछ लोग उन्हें संभाल रहे हैं। 19 साल की ये टेनिस खिलाड़ी झेंग किनवेन हैं, जिन्होंने हार के बाद कहा- काश मैं मर्द होती तो न पीरियड्स होते, न मैं हारती। झेंग के मुताबिक वो पीरियड्स का उनका पहला दिन था, जब ऐंठती हुई नसों और पेट दर्द के साथ उन्हें खेलना पड़ा।
एकदम सादी-सी बात। वो सच, जिससे करीब सारी औरतें महीने के महीने गुजरती हैं, लेकिन मर्दाना दिमाग को ये बात ललकार की तरह लगी। वे कितने तो गहरे जख्म झेलते हुए जंग जीत लाते हैं और उफ तक नहीं करते- यहां कच्ची उम्र की एक लड़की दर्द का ढकोसला कर रही है।
सोशल मीडिया पर लोग कहने लगे- आजकल की लड़कियां दर्द का नखरा करती हैं। कोई लिखने लगा- इतनी ही तकलीफ होती है तो खेलने क्यों निकली, घर बैठ जाती! कोई लिखने लगा- हमारी मांओं ने तो कभी खाना पकाने या कपड़े फींचने को लेकर ऐसी बहानेबाजी नहीं की।
एकदम सही बात! लड़कियां दर्द के चोंचले करती हैं और लगातार कर रही हैं। मियां प्यारे दफ्तर में हाड़तोड़ काम निबटा लौटते हैं तो चाय की प्याली की बजाय बिखरा हुआ घर मिलता है। रसोई पुराने कटे प्याज की गंध से महमहा रही है। एक तरफ अनधुले कपड़ों का छोटा-मोटा पहाड़ खड़ा है, दूसरी तरफ बच्चों की टोली नाक बहाती हुई आपस में गुंथी हुई है। इधर कमरे का किवाड़ सटाए बीवी सो रही है। वजह? उसे पीरियड्स आए हैं। जब शौहर खाना पकाएगा, तब जाकर वो उठेगी।
ये नखरा दो-एक दिनों तक चलेगा और तब तक चलता रहेगा, जब मेनोपॉज न आ जाए। इसके बाद हड्डियों की चटचटाहट का शोर गूंजने लगेगा। बीते जमाने के मर्द समझदार थे, वो जानते थे कि औरतों को एक बार रोने की छूट मिले तो वो अमीर के पेट की तरह पसरती ही चली जाएंगी।
इसलिए उन्होंने दर्द की दवा खोजने तक पर रोक लगी दी। साल 1590 से लेकर अगले एक साल तक स्कॉटलैंड में ऐसी औरतों की खोज चली जो दर्द का इलाज करती थीं। जो जंगलों में ऐसी बूटी खोजतीं, जो दर्द खींच सके। या रसोई में वो शोरबा पकातीं, जो औरत को ताकत दे।
माना गया कि ऐसी औरतें डायन हैं, जो औरतों की जिंदगी से दर्द हटाकर दुनिया को नरक बना रही हैं। दरअसल दर्द कुंदजहन औरतों को व्यस्त रखने का एक तरीका था, फिर चाहे वो बच्चे के जन्म में हो, या फिर पिटाई से। दर्द वो चाबुक था, जो जनानियों को आड़ा-टेढ़ा भागने से रोककर गृहस्थी में उलझाए रखता।
इसी दौर में एडिनबरा की एक महिला यूफेम मैक-कैलजीन ने डिलीवरी के दौरान दर्द कम करने वाली औषधि बनाने का दावा किया। झुंड की झुंड औरतें दवा मांगने पहुंचने लगीं। बस, इतना काफी था। यूफेम को पकड़कर आग में झोंक दिया गया। उसकी चीख की आवाज आग की चट-फट में दब गई। इसके बाद काफी सालों तक सन्नाटा रहा। किसी औरत ने दर्द कम करने की दवा न मांगी, न खोजी।
19वीं सदी के बीतते-बीतते एनेस्थीशिया यानी बेहोशी की दवाएं आ गईं। हालांकि औरतों का इससे कोई लेना-देना नहीं था। ये पुरुषों के काम आती, जो जंग हारकर या जीतकर लौटे हों, जो पड़ोसी से लड़ाई में घायल हो गए हों, या फिर जिन्हें कोई दूसरी तकलीफ हो। डिलीवरी के दौरान दर्द से चीखती और दम तोड़ती औरत पर एनेस्थीशिया का इस्तेमाल वर्जित था। जो औरत अपनी मेहनत से बच्चे तक को जन्म नहीं दे सकती, वो बाकी काम कैसे संभालेगी!
ये 21वीं सदी है, लेकिन हालात अब भी खास अलग नहीं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की साल 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक अस्पताल अब भी जनाना-मर्दाना दर्द में भेद करते हैं। अगर कोई औरत इमरजेंसी रूम में दर्द की शिकायत के साथ पहुंचती है तो उसे लंबा इंतजार कराया जाता है, जबकि मर्दों की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए लगभग तुरंत इलाज शुरू हो जाता है। यानी औरतों का दर्द अर्जेंट नहीं होता, बल्कि इंतजार कर सकता है।
साल 2018 में फ्रांस का एक मामला चर्चा में था, जिसमें 22 साल की महिला नाओमी मुसेंगा ने सिरदर्द की शिकायत के साथ इमरजेंसी में फोन किया। सुबकते हुए उसने कहा- इतना दर्द है कि मैं मर सकती हूं! इमरजेंसी में तैनात डॉक्टर ने दार्शनिक लहजे में जवाब दिया- एक न एक दिन तो सब मरते हैं! पांच घंटे के इंतजार के बाद आखिरकार जब महिला तक सर्विस पहुंची, स्ट्रोक और ऑर्गन फेल होने से उसकी मौत हो चुकी थी।
जवाब मांगने पर इमरजेंसी में तैनात डॉक्टर ने गला खंखारते हुए कहा- औरतें अक्सर छोटी-मोटी चीज को बड़ा बना देती हैं। इसलिए मामले पर ध्यान नहीं दे सका! औरत सिर दर्द की शिकायत करें तो रात में रोई-झींकी होगी। सीने में दर्द की कहे तो चटपटा खाया होगा। पेट में दर्द बताए तो पक्का औरतों वाली कोई छुटपुट बीमारी होगी। पैरों में दर्द की शिकायत करे तो बुढ़ा रही है। ऐसी मामूली शिकायत लेकर अस्पताल में भीड़ बढ़ाने वाली ज्यादातर औरतों को डॉक्टर एंटी-एंजायटी दवाएं दे देते हैं।
‘द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ की स्टडी बताती है कि दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंची महिलाओं को अक्सर मानसिक बीमारी या तनाव कम करने की दवा पकड़ा दी जाती है, जबकि मर्दों की पूरी जांच होती है।
रानी विक्टोरिया वो पहली औरत थीं, जिन्होंने प्रसव के दौरान दर्द कम करने की दवा चाही। रानी का इलाज कर रहा डॉक्टर बहुत बहसा-बहसी के बाद राजी हुआ कि वो उन्हें हल्का-सा क्लोरोफॉर्म देगा, बस, इतना कि वे दम न तोड़ दें। ये अप्रैल 1853 की बात है। क्वीन को भी उतनी ही राहत मिली, जितने से वे जी जाएं। दर्द खत्म करने की बात न तब हुई, न अब होती है














