
नई दिल्ली : सरकार ने पिछले 11 वर्षों में देश के शहरों की सूरत बदलने के लिए 8.36 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट खर्च किया है। लेकिन चौंकाने वाली हकीकत यह है कि इतना पैसा पानी की तरह बहाने के बाद भी शहरी जीवन सुधरने के बजाय और भी बदतर हो गया है। ‘जनाग्रह’ की हालिया रिपोर्ट ‘शेपिंग अर्बन इंडिया बाय डिजाइन, नॉट बाय डिफॉल्ट’ ने शहरी विकास के दावों की पोल खोल कर रख दी है। रिपोर्ट के अनुसार, शहरों का विस्तार तो हुआ है, लेकिन यह विकास इतना अनियंत्रित है कि अब महानगरों में सांस लेना और रहना दूभर हो गया है।
18 साल में 25 लाख हेक्टेयर बढ़ा दायरा, पर बुनियादी ढांचा हुआ ध्वस्त
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 18 वर्षों में शहरी क्षेत्रों का क्षेत्रफल 25 लाख हेक्टेयर बढ़ गया है। शहर कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे हैं, लेकिन वहां की ड्रेनेज व्यवस्था, सड़कों की स्थिति और शुद्ध पेयजल की उपलब्धता आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों का विकास ‘डिजाइन’ से नहीं बल्कि ‘डिफॉल्ट’ यानी अपने आप बिना किसी योजना के हो रहा है। यही कारण है कि आज देश का लगभग हर बड़ा शहर वायु प्रदूषण, जलभराव और ट्रैफिक जाम की समस्या से जूझ रहा है।
नीति आयोग के सदस्यों की मौजूदगी में जारी रिपोर्ट: डेटा के बिना बन रहे मॉडल
यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा, शहरी मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव डी. थारा और भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या की उपस्थिति में जारी की गई। रिपोर्ट में एक बड़ी खामी यह उजागर हुई है कि विकास मॉडल तैयार करने वाली संस्थाओं के पास पुख्ता ‘डेटा’ ही उपलब्ध नहीं है। बिना सटीक जानकारी के सभी शहरों के लिए एक जैसा (One Size Fits All) विकास मॉडल थोपा जा रहा है, जो स्थानीय समस्याओं को सुलझाने में नाकाम साबित हो रहा है।
किस शहर में क्या है बड़ी मुसीबत? रिपोर्ट ने किया चिह्नित
जनाग्रह की रिपोर्ट में देश के प्रमुख शहरों की दुखती रग पर हाथ रखा गया है:
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दिल्ली: जानलेवा वायु प्रदूषण।
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मुंबई: रहने के लिए घरों का भीषण संकट।
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बेंगलुरु: अंतहीन ट्रैफिक जाम की समस्या।
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कोलकाता: तेजी से घटती हरियाली।
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जयपुर: सड़कों पर बढ़ती दुर्घटनाएं।
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इंदौर: स्वच्छता के दावों के बीच दूषित पानी की चुनौती।
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झांसी: जर्जर और पुराना बुनियादी ढांचा।
जलभराव बना सबसे बड़ा नासूर, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता की जरूरत
रिपोर्ट में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी बारिश होते ही शहर डूब जाते हैं। ड्रेनेज सिस्टम फेल होने के कारण शहरी आबादी को बाढ़ जैसी आपदा का सामना करना पड़ता है। सुधार के लिए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि छोटे और मध्यम शहरों के लिए अलग मॉडल तैयार किया जाए और निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) को बढ़ावा दिया जाए। जब तक स्थानीय डेटा के आधार पर योजनाएं नहीं बनेंगी, तब तक भारी बजट खर्च करने के बाद भी शहरों की स्थिति नहीं सुधरेगी।













