अयोध्या। राम मंदिर चंदा और चढ़ावा चोरी कांड ने अयोध्या से लेकर दिल्ली तक के सियासी और धार्मिक गलियारों में भारी उथल-पुथल मचा दी है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और प्रमुख ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र के ‘नैतिक इस्तीफों’ के बाद अब ट्रस्ट के पूरे प्रशासनिक ढांचे को ही बदलने की चर्चाएं बेहद तेज हो गई हैं। बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन से एक पद पहले ही खाली था, और अब इन दो दिग्गजों के हटने के बाद ट्रस्ट के तीन सबसे महत्वपूर्ण और नीति-नियंता पद खाली होने जा रहे हैं। अयोध्या के संतों और कानूनी गलियारों में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि मौजूदा स्वरूप वाले ट्रस्ट को पूरी तरह भंग करके केंद्र सरकार इसका नए सिरे से पुनर्गठन (Reconstitution) कर सकती है।
फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद केंद्र सरकार ने इस हाई-प्रोफाइल ट्रस्ट की नींव रखी थी। भले ही इसके अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास बनाए गए, लेकिन मंदिर के रोजमर्रा के प्रशासन, वित्तीय लेनदेन और हर छोटे-बड़े फैसलों की पूरी कमान चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्र के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। अब इन दोनों के हटने से ट्रस्ट का आंतरिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। सूत्रों का दावा है कि रोजाना करोड़ों रुपये का चढ़ावा, लाखों श्रद्धालुओं का मैनेजमेंट, वीआईपी सुरक्षा और अरबों रुपये के निर्माण कार्यों को पारदर्शी बनाने के लिए अब ट्रस्ट में तिरुपति बालाजी और माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तर्ज पर एक बेहद पेशेवर प्रशासनिक ढांचा लागू किया जा सकता है, जिसके तहत भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) स्तर के एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की स्थाई तैनाती की जा सकती है।
बुजुर्ग और हाशिये पर रहे ट्रस्टी; क्या ट्रस्ट को भंग करना इतना आसान होगा?
ट्रस्ट के भीतर अंदरूनी कलह और एकाधिकार की कहानियां भी अब बाहर आने लगी हैं। बताया जा रहा है कि चंपत राय और अनिल मिश्र के रसूख के आगे कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि की भूमिका बेहद सीमित थी। वहीं संस्थापक ट्रस्टी के. परासरन, जगद्गुरु वासुदेवाचार्य, जगद्गुरु विश्वप्रसन्न तीर्थ और युगपुरुष परमानंद जैसे सम्मानित सदस्य अपनी अत्यधिक आयु और स्वास्थ्य कारणों से अयोध्या में नियमित सक्रिय नहीं रह पाते थे। निर्मोही अखाड़े के महंत दिनेंद्र दास को भी लगातार हाशिये पर रखा गया। हाल ही में कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद डॉ. कृष्ण मोहन को शामिल किया गया, जिन्होंने इस चोरी की एफआईआर (FIR) दर्ज कराई है।
कानूनी अड़चनें क्या हैं?
विधि मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ और अधिवक्ता दीनबंधु चौबे के अनुसार, इस ट्रस्ट को भंग करना केंद्र सरकार के लिए कोई साधारण प्रशासनिक खेल नहीं होगा। चूंकि इसका गठन सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में एक विशेष वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ था, इसलिए इसे बदलने या भंग करने के लिए केंद्र सरकार को पूरी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसके लिए नई आधिकारिक अधिसूचना (Notification) जारी करनी पड़ सकती है या कैबिनेट के जरिए नए वैधानिक प्रावधान तय करने होंगे।
बैंक की घोर लापरवाही उजागर: 25 लाख की डेली काउंटिंग के लिए नहीं था स्थाई स्टाफ
पुलिस और एसआईटी (SIT) की जांच में संबंधित बैंक की एक ऐसी घोर और अक्षम्य लापरवाही सामने आई है जिसने सबको चौंका दिया है। समझौते के मुताबिक, खाता संचालन से लेकर दान की रकम को गिनकर सुरक्षित बैंक तक पहुंचाने का पूरा अनुबंध (Contract) इसी बैंक के पास था। इसके बावजूद प्रतिदिन आने वाले 20 से 25 लाख रुपये के कैश को गिनने के लिए बैंक ने अपना एक भी स्थाई और जिम्मेदार अधिकारी वहां तैनात नहीं किया था। बैंक अधिकारी सिर्फ कभी-कभार जायजा लेने आते थे।
चाबियों का वो सीक्रेट खेल:
नियमानुसार रामलला की दान पेटियों (Donation Boxes) की दो अलग-अलग चाबियां होती हैं। एक चाबी मंदिर ट्रस्ट के पास और दूसरी बैंक के पास रहती थी। दोनों चाबियां एक साथ लगने पर ही पेटी खुलती थी। इसके बाद पेटियों को कड़ी सुरक्षा वाले स्ट्रॉन्ग रूम में लाकर खोला जाता था। नोटों की गिनती के बाद मौके पर ही तीन रिसीविंग कॉपियां बनती थीं—एक बैंक कर्मी के लिए, दूसरी मुख्य बैंक शाखा के लिए और तीसरी ट्रस्ट के रिकॉर्ड के लिए। इन तीनों प्रतियों पर उसी कमरे में साइन होते थे। इतने पुख्ता सिस्टम के बावजूद बैंक की ढिलाई का फायदा उठाकर चोरों ने करोड़ों की नकदी पार कर दी।
चंपत राय के ड्राइवर का सगा भतीजा भी निकला चोर; 5 साल से फ्री सेवा दे रहे पूर्व अधिकारी फेल
जांच में खुलासा हुआ है कि नोटों की गिनती में लगे अधिकांश कर्मचारी पहले मंदिर के निर्माण कार्य में मजदूर या सुपरवाइजर थे। काम खत्म होने के बाद उन्हें हटा दिया गया था, लेकिन बैंक अधिकारियों और ट्रस्ट के पदाधिकारियों की मिलीभगत व सिफारिश पर इन्हें दोबारा नोट गिनने के अति-संवेदनशील काम पर रख लिया गया।
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भाई-भतीजावाद का सबूत: महज दो महीने पहले भर्ती हुआ मुख्य आरोपी मनीष यादव (निवासी स्वर्गद्वार) इस पूरे गैंग का अहम हिस्सा बन चुका था। मनीष यादव कोई और नहीं, बल्कि चंपत राय के उस रसूखदार ड्राइवर टिन्नू यादव का सगा भतीजा है, जिसकी हनक के आगे सुरक्षाकर्मी भी सिर झुकाते थे।
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पर्यवेक्षक की नाकामी: साल 2016 में बैंक से रिटायर हो चुके सुभाष श्रीवास्तव पिछले 5 सालों से बिना कोई वेतन लिए (फ्री सेवा) मंदिर में इस काउंटिंग के सुपरविजन (निगरानी) का जिम्मा संभाल रहे थे। लेकिन अपनों को उपकृत करने और सिंडिकेट को खुली छूट देने के चक्कर में उनके स्तर पर भी घोर लापरवाही और संदिग्ध भूमिका की बात सामने आ रही है।
आरएमओ (RMO) छोड़ देते थे कंट्रोल रूम, सिपाहियों के भरोसे थी करोड़ों की निगरानी
डिजिटल सुरक्षा के मोर्चे पर भी जो खिलवाड़ हुआ, वह हैरान करने वाला है। काउंटिंग रूम और स्ट्रॉन्ग रूम की लाइव फुटेज देखने के लिए दो अत्याधुनिक कंट्रोल रूम बनाए गए हैं। इन कैमरों की चौबीसों घंटे लाइव मॉनिटरिंग और सुरक्षा सुनिश्चित करने की सीधी जिम्मेदारी आरएमओ (RMO) अर्जुन देव की थी।
नियमों के मुताबिक, आरएमओ को हर वक्त स्क्रीन पर नजर रखनी थी कि नोट गिनने वाले क्या कर रहे हैं। लेकिन सूत्रों का दावा है कि आरएमओ अपनी मूल जिम्मेदारी को छोड़कर मंदिर ट्रस्ट के अन्य मैनेजमेंट और वीआईपी व्यवस्थाओं के कार्यों में ज्यादा सक्रिय रहते थे। नतीजतन, कंट्रोल रूम की स्क्रीन की जिम्मेदारी गैर-जनपदों से आए साधारण सिपाहियों के भरोसे छोड़ दी जाती थी। शातिर चोरों ने अधिकारियों की इसी लापरवाही और ढीले रवैये का फायदा उठाकर कैमरों के सामने नोट उड़ाए। हालांकि, अब तक आरएमओ अर्जुन देव की इस मामले में कोई प्रत्यक्ष आपराधिक भूमिका तय नहीं हो सकी है, लेकिन विभागीय गाज गिरना तय माना जा रहा है। दूसरी ओर, पुलिस अधिकारियों का दावा है कि केवल दान पेटियों से ही नकदी चुराई गई है, जबकि सीधे ट्रस्ट को डोनेट किए गए सोने-चांदी के जेवरात और कीमती सामान पूरी तरह सुरक्षित हैं, हालांकि ठेकों में हुई गड़बड़ी पर अधिकारी मौन साधे हुए हैं।













