- समलैंगिक विवाह को एलीट कहना गलत, सरकार के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली (हि.स.)। समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग पर सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार का ये कथन सही नहीं है कि समलैंगिक विवाह शहरी पढ़े-लिखे अभिजात्य (एलीट) लोगों की संकल्पना है। खासकर तब जब इसके पक्ष में कोई आंकड़ा नहीं हो। सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच इस मामले पर 20 अप्रैल को भी सुनवाई करेगी।
केंद्र सरकार ने इस मामले में सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को भी पक्षकार बनाये जाने की मांग की है। केंद्र सरकार ने कहा है कि राज्यों को इस विषय पर कानून बनाने के अधिकार है और वो कोर्ट के फैसले से प्रभावित होंगे। आज केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार ने अपने स्तर पर राज्यों से मशविरा शुरू कर दिया है और पत्र लिखकर उनसे इस पर राय मांगी है। इस मामले में राज्यों को भी पक्षकार बनाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील मुकुल रोहतगी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि केंद्रीय कानून को चुनौती दी गई है, इसलिए राज्यों को पक्षकार बनाने की ज़रूरत नहीं है।
रोहतगी ने कहा कि सुधार भी एक सतत प्रक्रिया है। हालांकि, यहां अलग से किसी नियम या नए सिद्धांत की बात नहीं कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि हम संसद नहीं जा सकते, लेकिन हम यहां अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी स्तर पर एक व्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रभावित होता है, तो उसे कोर्ट जाने का अधिकार है।
सुनवाई के दौरान वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण इस वर्ग का भेदभावपूर्ण बहिष्कार केवल सेक्स और यौन रुझान पर आधारित है। उन्होंने समलैंगिक जोड़ों के लिए संतान के मामले पर दलील देते हुए कहा कि उनके लिए भी विकल्प है, जिसकी वजह से परिवार की दलील पूरी हो जाती है। उन्होंने कहा कि विवाह की वैधता विवाह की उपस्थिति या संभावना पर निर्भर नहीं करती है। तब चीफ जस्टिस ने कहा कि आपका कहना है कि राज्य किसी व्यक्ति के साथ उस विशेषता के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता है, जिस पर किसी व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं है। तब सिंघवी ने कहा कि बिल्कुल। अगर मेरा रुझान अलग हो तो मुझे मेरे अधिकार से वंचित नहीं कर सकते। सिंघवी ने मंदिरों में प्रवेश से लेकर विकलांगता के मुद्दों तक सभी प्रकार के भेदभावों पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा किए गए हस्तक्षेप और उनके फैसलों का हवाला भी दिया।
चीफ जस्टिस ने कहा कि य़ह अपनी अभिव्यक्तियों में शहरी इलाकों से लोग ज्यादा है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में अधिक लोग इसमें शामिल हैं। हालांकि सरकार की ओर से कोई आंकड़ा नहीं है कि उसमें शहरी या गांव के हैं। जस्टिस रविंद्र भट्ट ने कहा कि कुछ चीजें हैं, जो बिना किसी बाधा के की जा सकती है। आपको पहचानना होगा और हमें बताना होगा। इस पर वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि जब यह अदालत इस मामले में वैधता पर निर्णय दे देगी, तो इन चिंताओं पर भी लगाम लग जाएगी, क्योंकि तब समलैंगिक जोड़ों को बैंक और बीमा कंपनियों आदि के लिए शादी के सर्टिफिकेट की समस्या नहीं होगी।
वकील केवी विश्वनाथन ने कहा कि मेरी मुवक्किल ट्रांसजेंडर हैं। उनके परिवार ने उनको त्याग दिया था। उन्होंने अपने जीवनयापन के लिए भीख तक मांगी है और आज वह केपीएमजी में निदेशक हैं। उनके लिए एक शहरी अभिजात्य वर्ग का होने की बात एक झूठ है। फ़िलहाल वह एक्ट के तहत सरकार द्वारा नामित ट्रांसजेंडर काउंसिल की सदस्य हैं।
इस संविधान बेंच में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस एस रवींद्र भट, जस्टिस हीमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल रहेंगे। 13 मार्च को कोर्ट ने इस मामले को संविधान बेंच को रेफर कर दिया था।












