
दो और केंद्रीय मंत्रियों पर दांव लगा सकती है भाजपा
भोपाल (ईएमएस) । मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने नया दांव खेलकर क्या कांग्रेस और क्या राजनीति के रणनीतिकारों सबको चौंका दिया है। जब भाजपा के चाणक्य और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मध्यप्रदेश को टैकओवर किया था कि, तब ही स्पष्ट रूप से समझ आ गया था कि, इस बार भाजपा मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव हर कीमत पर जीतने के लिए कुछ अलग अंदाज में लड़ेगी। भाजपा ने 39 प्रत्याशियों की दूसरी सूची में जिस तरह से तीन केंद्रीय मंत्रियों और सात सांसदों का दांव खेला है, उससे यह साबित भी हो गया है। माना जा रहा है कि भाजपा अब विधानसभा चुनाव की अगली सूची में दो और केंद्रीय मंत्रियों और कुछ और सांसदों को मैदान में उतार सकती है। इसमें केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और वीरेन्द्र खटिक के नाम हो सकते हैं।
जानकारी के लिए बता दें कि इस बार भाजपा मध्यप्रदेश में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है। मोदी सरकार में मध्यप्रदेश का दबदबा रहा है। मोदी सरकार में सर्वश्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, फग्गन सिंह कुलदस्ते, ज्योतिरादित्य सिंधिया और वीरेंद्र खटिक केन्द्रीय मंत्री हैं। इनमें से तीन केंद्रीय मंत्रियों नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद सिंह पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते को भाजपा ने विधानसभा चुनाव के मैदान में उतार दिया है। अब मध्यप्रदेश से दो और केन्द्रीय मंत्री बचे हैं, जिन्हें भी चुनावी मैदान में उतरने की अटकलें शुरू हो गई है। पार्टी केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को ग्वालियर-चंबल संभाग से किसी सीट से चुनाव लड़ा सकती है। इसके साथ केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक को बुंदेलखंड को साधने के लिए चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है।
सिंधिया क्यों विस चुनाव लड़ा सकती है भाजपा
भाजपा यह अच्छी तरह से जानती है कि ग्वालियर-चंबल संभाग में श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया का अपना अलग औरा (प्रभाव) है। इस क्षेत्र में कांग्रेस हो या भाजपा के नेता, सिंधिया परिवार के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। तथा सिंधिया के बिना बड़ी जीत का रास्ता प्रशस्त नहीं हो सकता। इसलिए ग्वालियर-चंबल संभाग में ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने के लिए भाजपा किसी भी सीट से सिंधिया को मैदान में उतार सकती है। हम बता दें कि ग्वालियर-चंबल संभाग में 8 जिलों की 34 विधानसभा सीटें आती हैं। 2018 में इनमें से कांग्रेस के खाते में 26 सीटें आई थीं। जबकि भाजपा को सिर्फ 7 सीटों से संतोष करना पड़ा था। यह स्थिति तब थी जब सिंधिया कांग्रेस में थे।














