1 जनवरी 2026 को Rashtra Katha का शुभारंभ : Ayodhya में बृजभूषण शरण सिंह की पहल और परम पूज्य महाराज की वाणी से सजा आध्यात्मिक मंच

अयोध्या की भूमि जब किसी आयोजन का साक्षी बनती है, तो वह केवल एक कार्यक्रम नहीं रहता – वह अनुभूति बन जाता है। “बांके बिहारी से अवध बिहारी तक की दिव्य यात्रा” शीर्षक से आयोजित राष्ट्रकथा महोत्सव भी उसी अनुभूति का विस्तार है, जहाँ भक्ति, मर्यादा और राष्ट्रचेतना एक ही प्रवाह में बहती दिखाई देती है। यह आयोजन अयोध्या को केवल कथा का केंद्र नहीं बनाता, बल्कि उसे विचार और संस्कार की जीवंत भूमि के रूप में प्रस्तुत करता है।

इस राष्ट्रकथा का शुभारंभ एक ऐसे भाव के साथ होता है, जिसमें औपचारिकता से अधिक आत्मीयता दिखाई देती है। उद्घाटन का क्षण मंच पर दीप प्रज्वलन या शब्दों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह उस संकल्प को प्रकट करता है जिसके साथ यह यात्रा आरंभ होती है – एक ऐसी यात्रा जो वृंदावन की बाल-भक्ति से निकलकर अयोध्या की मर्यादित चेतना तक पहुँचती है। “बांके बिहारी से अवध बिहारी” का यह भाव स्वयं में एक संदेश है कि भक्ति और कर्तव्य, भावना और अनुशासन, एक-दूसरे के पूरक हैं।

इस आयोजन की गरिमा को दिशा देती है बृजभूषण शरण सिंह की उपस्थिति। उनका सान्निध्य राष्ट्रकथा को केवल आध्यात्मिक मंच नहीं रहने देता, बल्कि उसे सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ता है। उनके विचारों में संस्कृति के प्रति सम्मान और युवा पीढ़ी के लिए उत्तरदायित्व की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। आयोजन उनके संरक्षण में एक संतुलित स्वरूप ग्रहण करता है – जहाँ व्यवस्था, अनुशासन और भावनात्मक जुड़ाव एक साथ चलते हैं।

कथा-वाचन की धुरी हैं परम पूज्य सद्गुरु श्री ऋतेश्वर जी। उनकी वाणी में शास्त्र और जीवन के बीच कोई दूरी नहीं रहती। राष्ट्रकथा के इस शुभारंभ के साथ उनकी कथा-शैली श्रोताओं को सीधे संवाद में आमंत्रित करती है। रामकथा की मर्यादा, हनुमंत कथा का समर्पण और कृष्णकथा की करुणा – ये सभी तत्व उनके शब्दों में जीवन के व्यावहारिक संदर्भों से जुड़ते दिखाई देते हैं। यही कारण है कि कथा केवल सुनी नहीं जाती, बल्कि भीतर उतारी जाती है।

यह राष्ट्रकथा नंदिनी निकेतन परिसर में आयोजित है, जहाँ वातावरण को सादगी और आध्यात्मिक गरिमा के साथ सजाया गया है। मंच की सज्जा से लेकर बैठने की व्यवस्था तक, हर तत्व इस भाव को पुष्ट करता है कि श्रोता यहाँ केवल दर्शक नहीं, बल्कि इस यात्रा के सहभागी हैं। आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सौंदर्य का संतुलन आयोजन को समकालीन होते हुए भी जड़ों से जुड़ा रखता है।

राष्ट्रकथा महोत्सव का यह उद्घाटन केवल एक आरंभ नहीं, बल्कि एक प्रवाह का संकेत है। इस प्रवाह में राष्ट्रचेतना, सनातन परंपरा, ज्ञान-विज्ञान और जीवन को संतुलित ढंग से जीने की कला एक साथ दिखाई देती है। कथा के माध्यम से यह भाव उभरता है कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि मूल्यों से बनता है – और उन मूल्यों का संचार संवाद के माध्यम से होता है।

इस आयोजन में कुछ तिथियाँ भावनात्मक रूप से विशेष स्थान रखती हैं। कथा के क्रम में 5 जनवरी को परम पूज्य महाराज का जन्मदिवस साधना और सेवा के भाव से जुड़ता है, जबकि 8 जनवरी को बृजभूषण शरण सिंह का जन्मदिवस राष्ट्रकथा की यात्रा को एक सार्थक पूर्णता प्रदान करता है। ये तिथियाँ आयोजन को व्यक्तिगत और सामूहिक भाव – दोनों स्तरों पर अर्थ देती हैं।

पवित्र नगरी अयोध्या के लिए यह उद्घाटन एक सांस्कृतिक क्षण है, जहाँ अतीत स्मृति बनकर नहीं, बल्कि प्रेरणा बनकर उपस्थित रहता है। यह राष्ट्रकथा महोत्सव अयोध्या को केवल धार्मिक केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि विचार और जीवन-दृष्टि के मंच के रूप में स्थापित करता है।

कुल मिलाकर, राष्ट्रकथा का यह शुभारंभ एक ऐसी यात्रा की शुरुआत है, जिसमें हर श्रोता अपने भीतर कुछ खोजता है – शांति, दिशा, या फिर एक नया दृष्टिकोण। “बांके बिहारी से अवध बिहारी” तक की यह दिव्य यात्रा मंच से शुरू होकर मन तक पहुँचती है, और वहीं अपनी वास्तविक पूर्णता पाती है।

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