ISRO का भविष्य क्या? निजीकरण पर 9 कर्मचारी संगठनों ने उठाए बड़े सवाल

नई दिल्ली। भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए लगातार खुल रहा है। सरकार की इस नीति से देश में निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए नए अवसर जरूर बने हैं, लेकिन अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के कर्मचारियों के बीच अपनी भूमिका और भविष्य को लेकर चिंता सामने आई है। इसरो के अलग-अलग केंद्रों से जुड़े 9 कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष विभाग और इसरो प्रमुख से प्रस्तावित बदलावों को लेकर स्पष्ट जवाब मांगा है।

कर्मचारी संगठनों का मुख्य सवाल है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने के बाद ISRO की भविष्य में वास्तविक भूमिका क्या रहेगी? क्या इसरो रॉकेट और सैटेलाइट का निर्माण पहले की तरह करता रहेगा या इन गतिविधियों को धीरे-धीरे निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को सौंप दिया जाएगा?

इसरो प्रमुख को भेजा पत्र

इन कर्मचारी संगठनों ने 4 सितंबर को ISRO अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव वी. नारायणन को पत्र भेजकर सरकार की अंतरिक्ष नीति पर स्पष्टीकरण मांगा है। पत्र पर इसरो के विभिन्न केंद्रों से जुड़े कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर हैं।

इनमें ISRO Staff Association, SHAR Employees Association, ISAC Employees Association और ISRO Staff Association-LPSC समेत कई संगठनों के नाम शामिल हैं।

संगठनों का कहना है कि निजी क्षेत्र को अंतरिक्ष गतिविधियों में बढ़ावा देने को लेकर सार्वजनिक मंचों पर कई बयान सामने आए हैं, लेकिन कर्मचारियों को इस नीति के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में अब तक कोई स्पष्ट आधिकारिक रोडमैप नहीं बताया गया है।

PSLV और LVM3 को लेकर सबसे बड़ा सवाल

कर्मचारियों की चिंता हालिया बयान के बाद और बढ़ी है। कर्मचारी संगठनों ने IN-SPACe के चेयरमैन पवन कुमार गोयनका के उस बयान का हवाला दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ISRO भविष्य में लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा किया जाएगा।

संगठनों के मुताबिक, छोटे उपग्रह प्रक्षेपण यान SSLV के निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी की दिशा में कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं। अब उन्हें आशंका है कि भविष्य में PSLV और LVM3 जैसे प्रमुख लॉन्च व्हीकल के निर्माण की जिम्मेदारी भी निजी कंपनियों को दी जा सकती है।

इसीलिए कर्मचारी संगठनों ने सरकार से पूछा है कि इन रॉकेटों और इनके भविष्य के संस्करणों के डिजाइन, विकास, निर्माण, एकीकरण, परीक्षण और लॉन्च में ISRO की भूमिका क्या रहेगी।

सैटेलाइट निर्माण और लॉन्च सेंटर पर भी सवाल

सिर्फ रॉकेट निर्माण ही नहीं, कर्मचारी संगठनों ने सैटेलाइट निर्माण को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि ISRO में नियमित रूप से होने वाले सैटेलाइट निर्माण कार्य को भी भविष्य में बाहरी कंपनियों को दिए जाने की चर्चा है।

इसके अलावा तमिलनाडु के कुलशेखरपट्टिनम में विकसित किए जा रहे नए स्पेस लॉन्च कॉम्प्लेक्स जैसे बुनियादी ढांचे के निजी इस्तेमाल को लेकर भी संगठनों ने स्पष्टीकरण मांगा है।

संगठनों के मुताबिक, ISRO की करीब 120 तकनीकों को पहले ही निजी क्षेत्र में ट्रांसफर किया जा चुका है। ऐसे में वे जानना चाहते हैं कि सरकार निजी कंपनियों को तकनीक और सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ ISRO की अपनी तकनीकी और उत्पादन क्षमता को किस तरह बनाए रखेगी।

नौकरी और प्रमोशन पर असर की चिंता

कर्मचारी संगठनों की सबसे बड़ी चिंता रोजगार और करियर को लेकर है। उनका कहना है कि अगर ISRO रॉकेट और सैटेलाइट निर्माण से बड़े स्तर पर पीछे हटता है, तो मौजूदा कर्मचारियों की जिम्मेदारियां प्रभावित हो सकती हैं।

इसका असर कर्मचारियों के स्थानांतरण, पदों की संख्या, पदोन्नति, कौशल विकास और भविष्य की भर्ती पर पड़ने की आशंका जताई गई है। संगठनों का कहना है कि तकनीकी और वैज्ञानिक कर्मचारियों के अलावा प्रशासन, खरीद, गुणवत्ता नियंत्रण, सुरक्षा और अन्य विभागों में भी करियर के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

भविष्य में ISRO में भर्ती कम होने की स्थिति में अंतरिक्ष क्षेत्र में करियर बनाने की तैयारी कर रहे युवाओं के अवसरों पर भी असर पड़ सकता है।

निजी कंपनियों की भागीदारी के खिलाफ नहीं संगठन

कर्मचारी संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी के विरोधी नहीं हैं। उनका कहना है कि निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना और अंतरिक्ष गतिविधियों का व्यावसायीकरण अपनी जगह जरूरी हो सकता है।

उनकी आपत्ति इस बात को लेकर है कि निजी क्षेत्र को सक्षम बनाने और ISRO की अपनी तकनीकी एवं निर्माण क्षमता को कमजोर करने के बीच सीमा स्पष्ट नहीं है।

संगठनों ने सरकार से एक स्पष्ट नीति दस्तावेज जारी करने की मांग की है, ताकि कर्मचारियों को पता चल सके कि आने वाले वर्षों में ISRO किन क्षेत्रों में मुख्य भूमिका निभाएगा और किन गतिविधियों में निजी कंपनियों को जिम्मेदारी दी जाएगी।

सरकार से मांगा गया स्पष्ट रोडमैप

कर्मचारी संगठनों ने विशेष रूप से पूछा है कि क्या पवन कुमार गोयनका का बयान सरकार की आधिकारिक नीति को दर्शाता है। इसके साथ ही उन्होंने PSLV, LVM3, SSLV और इनके भविष्य के संस्करणों को लेकर ISRO की जिम्मेदारी स्पष्ट करने की मांग की है।

अब नजर इस बात पर है कि अंतरिक्ष विभाग और ISRO नेतृत्व इन सवालों पर क्या जवाब देता है। भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ना तय माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ ISRO की संस्थागत, तकनीकी और निर्माण क्षमता को किस रूप में बनाए रखा जाएगा, यह आने वाले समय में नीति का सबसे अहम सवाल बन सकता है।

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