
प्रयागराज। कभी देश की राजनीति को दिशा देने वाला प्रयागराज आज राष्ट्रीय राजनीति में अपने मजबूत प्रतिनिधित्व को तलाश रहा है। इसके लिए कहीं न कहीं हम खुद भी जिम्मेदार हैं। हमने हेमवती नंदन बहुगुणा को हराया, डॉ. मुरली मनोहर जोशी को हराया। जिन नेताओं ने प्रयागराज के विकास और राष्ट्रीय राजनीति में शहर की भूमिका मजबूत करने की क्षमता दिखाई, उन्हें भी हमने कभी जातीय तो कभी स्थानीय समीकरणों के आधार पर नकार दिया।
आज फिर हमारे सामने एक अवसर खड़ा हो सकता है।
चर्चाएं हैं कि उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य प्रयागराज से चुनाव लड़ सकते हैं। इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं है और न ही इस विषय पर मेरी उनसे कोई बातचीत हुई है। लेकिन यदि ऐसा होता है तो प्रयागराज को इसे सामान्य चुनाव की तरह नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक भविष्य के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
मेरा सवाल किसी पत्रकार या राजनीतिक दल के समर्थक के तौर पर नहीं, बल्कि एक इलाहाबादी के तौर पर है—आज प्रदेश और देश की राजनीति में ऐसा कौन सा नेता है, जो प्रयागराज की आवाज को सबसे मजबूती से उठा सकता है और शहर के विकास को नई गति दे सकता है?
मेरा उत्तर है—केशव प्रसाद मौर्य।
रायबरेली और सैफई ने अपने राजनीतिक नेतृत्व को लगातार मजबूत किया। प्रयागराज भी जाति और दल से ऊपर उठकर अपने शहर के हित में फैसला क्यों नहीं कर सकता?
यदि केशव प्रसाद मौर्य प्रयागराज से चुनाव लड़ते हैं, तो फैसला केवल यह न हो कि उम्मीदवार किस जाति या दल का है। सवाल यह हो कि कौन प्रयागराज को लखनऊ और दिल्ली की सत्ता में सबसे प्रभावी आवाज दे सकता है?
प्रयागराज ने देश को नेतृत्व दिया है। अब समय है कि प्रयागराज फिर अपना राजनीतिक महत्व पहचाने।
यह अपील किसी नेता के लिए नहीं, अपने शहर के भविष्य के लिए है।
एक इलाहाबादी होने के नाते इससे बड़ा सवाल और क्या हो सकता है कि—
क्या हम इस बार भी वही गलती दोहराएंगे, या प्रयागराज को फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने का अवसर चुनेंगे?













