ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग पहुंची सुप्रीम कोर्ट, आज ऐतिहासिक सुनवाई….जानिए याचिकाओं में क्या की गई है मांग?

देश की लोकतांत्रिक प्रणाली और स्वतंत्र चुनाव व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले भारत निर्वाचन आयोग के कामकाज और निर्णयों पर उठे गंभीर सवालों का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को उनके पद से निलंबित करने और आयोग में कथित तौर पर बिना सर्वसम्मति के लिए गए कई अहम फैसलों को रद्द करने की मांग वाली जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में आज, सोमवार को बेहद अहम सुनवाई होने जा रही है। आरोप लगाए गए हैं कि निर्वाचन आयोग में कई बड़े बदलाव और फैसले दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों की आवश्यक सहमति के बिना, एकतरफा तरीके से लागू कर दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट से सीईसी को कार्यमुक्त करने और आपराधिक कार्रवाई की मांग

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करेगी। याचिका में अदालत से गुहार लगाई गई है कि जब तक इस संवेदनशील मामले पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक ज्ञानेश कुमार को सीईसी के दायित्वों से अलग रखा जाए। इसके स्थान पर चुनाव आयोग के दैनिक और नीतिगत कार्यों का संचालन दोनों अन्य निर्वाचन आयुक्तों की आपसी सर्वसम्मत राय से कराने के निर्देश दिए जाएं। इसके अलावा, अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका में अपने आधिकारिक कर्तव्यों के कथित गंभीर उल्लंघन के मामले में सीईसी और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की भी पुरजोर मांग की गई है। याचिका में वर्ष 2023 के चुनाव आयोग अधिनियम की धारा 18 का स्पष्ट हवाला देते हुए रेखांकित किया गया है कि आयोग के भीतर किसी भी मुद्दे पर मतभेद की स्थिति में अंतिम फैसला बहुमत के आधार पर ही लागू किया जा सकता है, न कि व्यक्तिगत रूप से।

सॉफ्टवेयर बदलाव और एकतरफा फैसलों पर लगे कई संगीन आरोप

याचिकाकर्ताओं का सीधा और स्पष्ट आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने उन विशेषाधिकारों का व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल किया, जो देश के कानून और संविधान के मुताबिक पूरे तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग के पास संयुक्त रूप से निहित हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस याचिका में उन सभी विवादास्पद दिशा-निर्देशों, प्रशासनिक फैसलों और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े सॉफ्टवेयर में किए गए संशोधनों को चुनौती दी गई है, जिन्हें कथित तौर पर बाकी दो निर्वाचन आयुक्तों को अंधेरे में रखकर लागू किया गया।

एसआईआर और 10 महीनों में 14 बार आपत्तियों का विवाद

अदालत पहुंचे इस विवाद का मुख्य केंद्र चुनावी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े फैसले भी हैं। याचिका में एक मीडिया रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि आयोग के दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों के भीतर कम से कम 14 बार विभिन्न फैसलों, नए आदेशों और प्रशासनिक बदलावों पर अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। हालांकि, इन तीखे आरोपों के जवाब में चुनाव आयोग का पक्ष है कि किसी भी संवैधानिक निकाय या लोकतांत्रिक संस्था के भीतर अलग-अलग विचारों, सुझावों और टिप्पणियों का होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसके द्वारा जारी किए गए सभी आदेश पूरी तरह से कानूनी रूप से वैध और प्रक्रियात्मक हैं।

फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची पुनरीक्षण पर उठे तीखे सवाल

याचिका में नए मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को भी कटघरे में खड़ा किया गया है। आरोप है कि मतदाता फॉर्म में पूर्वजों की विस्तृत जानकारी और पुरानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से लिंक करने जैसी जटिल शर्तें सॉफ्टवेयर कोड के माध्यम से जोड़ दी गईं। याचिकाकर्ता का दावा है कि इस बड़े बदलाव के लिए जो विधिक और कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है, उसका बिल्कुल भी पालन नहीं किया गया। इसके साथ ही याचिका में गोवा और पश्चिम बंगाल के मामलों का विशेष उल्लेख किया गया है। गोवा में अदालत और प्रशासन के निर्देशों के बावजूद 97 पात्र मतदाताओं के नाम बहाल नहीं हो सके, क्योंकि सॉफ्टवेयर में ऐसी कोई तकनीकी सुविधा ही उपलब्ध नहीं थी। वहीं पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों से जुड़ी 16.10 लाख से अधिक लंबित अपीलों के निस्तारण में हुई लापरवाही को भी कोर्ट के सामने प्रमुखता से रखा गया है।

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