
नई दिल्ली। बचपन से किताबों, स्कूलों और इंटरनेट पर दुनिया का जो नक्शा हम देखते आए हैं, उसमें आने वाले समय में बदलाव नजर आ सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर को ‘Correct the Map’ प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसका उद्देश्य ऐसे विश्व मानचित्रों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जिनमें देशों और महाद्वीपों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब दिखाई दे।
प्रस्ताव के पक्ष में भारत समेत 164 देशों ने मतदान किया, जबकि अमेरिका ने इसका विरोध किया। छह देश मतदान से दूर रहे। हालांकि, इस फैसले का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र ने किसी देश की सीमा या क्षेत्रफल बदल दिया है। यह पहल मुख्य रूप से पृथ्वी को सपाट नक्शे पर दिखाने के तरीके से जुड़ी है।
UN ने किसी देश की सीमा नहीं बदली
पृथ्वी गोल है, जबकि कागज या मोबाइल-कंप्यूटर की स्क्रीन सपाट होती है। ऐसे में पूरी पृथ्वी को एक फ्लैट मैप पर दिखाने के दौरान किसी न किसी हिस्से में विकृति आना स्वाभाविक है।
यही वजह है कि अलग-अलग जरूरतों के लिए अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन इस्तेमाल किए जाते हैं। कुछ नक्शे क्षेत्रफल को ज्यादा सही दिखाते हैं, जबकि कुछ दिशा, कोण या दूरी को प्राथमिकता देते हैं।
संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब है कि प्रस्ताव पारित होते ही दुनिया के सभी स्कूलों, वेबसाइटों और मोबाइल ऐप्स पर कोई एक नया नक्शा लागू नहीं होगा।
भारत ने प्रस्ताव का समर्थन क्यों किया?
भारत ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए यह स्पष्ट किया कि इसे इक्वल एरिया मैप प्रोजेक्शन के व्यापक इस्तेमाल को बढ़ावा देने के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत ने किसी एक खास मैप प्रोजेक्शन को ही हर परिस्थिति के लिए सही नहीं माना है।
भारतीय प्रतिनिधि ने यह भी स्पष्ट किया कि अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग नक्शों की जरूरत होती है। किसी प्रोजेक्शन में क्षेत्रफल को प्राथमिकता दी जाती है, तो किसी में दिशा या कोण को।
भारत ने अपने संप्रभु क्षेत्र के चित्रण को लेकर भी स्पष्ट रुख रखा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार, भारत का संप्रभु क्षेत्र, जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, आधिकारिक भारतीय नक्शे के अनुरूप ही दिखाया जाना चाहिए। भारत ने किसी भी गलत या भ्रामक चित्रण को स्वीकार नहीं करने की बात कही है।
अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध क्यों किया?
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका इस प्रस्ताव का विरोध करने वाला अकेला देश रहा। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने बहस के दौरान इस पहल पर सवाल उठाए। अमेरिकी पक्ष का तर्क था कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की मौजूदा गंभीर समस्याओं पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, न कि 16वीं सदी के नक्शे को बदलने जैसी बहस पर।
अमेरिका ने इस पहल को एक तरह के वैचारिक एजेंडे के रूप में भी देखा।
इसके उलट अफ्रीकन यूनियन ने प्रस्ताव का स्वागत किया। अफ्रीकी देशों के लिए यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं है। उनका कहना है कि लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा मर्केटर प्रोजेक्शन अफ्रीका के वास्तविक आकार को कम करके दिखाता है।
मर्केटर नक्शे में क्या गड़बड़ी है?
दुनिया के सबसे चर्चित नक्शों में मर्केटर प्रोजेक्शन शामिल है। इसे जर्मन-फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में तैयार किया था। उस दौर में इसका मुख्य उद्देश्य समुद्री यात्राओं और दिशाओं को समझना आसान बनाना था।
मर्केटर प्रोजेक्शन ने नेविगेशन के लिए महत्वपूर्ण सुविधा दी, लेकिन इसकी एक बड़ी कमी क्षेत्रफल की विकृति है। भूमध्य रेखा से जितना दूर जाते हैं, नक्शे पर जमीन का आकार उतना ही बढ़ा हुआ दिखाई देने लगता है।
इसी वजह से ग्रीनलैंड, कनाडा, रूस और उत्तरी यूरोप जैसे क्षेत्र वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में काफी बड़े नजर आते हैं।
ग्रीनलैंड और अफ्रीका इसकी सबसे चर्चित मिसाल हैं। नक्शे पर दोनों का आकार कई बार लगभग समान नजर आता है, जबकि वास्तविकता में अफ्रीका करीब 14 गुना बड़ा है। अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है, जबकि ग्रीनलैंड लगभग 22 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है।
इक्वल एरिया मैप क्या बदलेगा?
UN के प्रस्ताव में इक्वल एरिया प्रोजेक्शन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य नक्शे पर देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल को वास्तविक अनुपात के ज्यादा करीब रखना है।
इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन इसका एक उदाहरण है। इसे 2018 में बोजन सावरिक, टॉम पैटरसन और बर्नहार्ड जेनी ने विकसित किया था।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इक्वल एरिया नक्शा पृथ्वी को हर लिहाज से बिल्कुल सटीक दिखा देगा। गोल पृथ्वी को सपाट सतह पर दिखाने में किसी न किसी तरह की विकृति बनी रहती है। अगर क्षेत्रफल को सही रखा जाता है तो आकार, दूरी या दिशा में कुछ अंतर आ सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत के लिए इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि देश का वास्तविक क्षेत्रफल या सीमा बिल्कुल नहीं बदलेगी। भारत की जमीन, अंतरराष्ट्रीय सीमाएं और संप्रभु क्षेत्र जैसे हैं, वैसे ही रहेंगे।
बदलाव केवल नक्शे पर भारत के दिखाई देने वाले आकार और दूसरे देशों के साथ उसकी तुलना में हो सकता है।
भारत भूमध्य रेखा के उत्तर में लगभग 20 से 30 डिग्री अक्षांश के बीच स्थित है। इसलिए मर्केटर प्रोजेक्शन की विकृति भारत पर ग्रीनलैंड, कनाडा या उत्तरी यूरोप की तुलना में कम है। फिर भी इक्वल एरिया प्रोजेक्शन में भारत का क्षेत्रफल दूसरे देशों की तुलना में अधिक वास्तविक अनुपात में नजर आएगा।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं:
- भारत का वास्तविक क्षेत्रफल: नहीं बदलेगा।
- भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा: नहीं बदलेगी।
- भारत का संप्रभु क्षेत्र: नहीं बदलेगा।
- नक्शे पर आकार: प्रोजेक्शन के अनुसार बदल सकता है।
- दूसरे देशों से क्षेत्रफल की तुलना: ज्यादा वास्तविक दिखाई दे सकती है।
अफ्रीका की तस्वीर में सबसे बड़ा बदलाव
अगर इक्वल एरिया प्रोजेक्शन का इस्तेमाल बढ़ता है तो इसका सबसे स्पष्ट असर अफ्रीका के आकार पर दिखाई देगा। मर्केटर नक्शे में अफ्रीका अपेक्षाकृत छोटा नजर आता है, जबकि उत्तरी अक्षांशों के क्षेत्र जरूरत से ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं।
इक्वल एरिया नक्शे में अफ्रीका का विशाल वास्तविक आकार ज्यादा स्पष्ट होगा। इससे दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के आकार को लेकर लोगों की पारंपरिक धारणा भी बदल सकती है।
क्या अब Google Maps और स्कूलों के नक्शे बदल जाएंगे?
फिलहाल ऐसा नहीं कहा जा सकता। UN का प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है और यह किसी एक नक्शे को पूरी दुनिया के लिए अनिवार्य नहीं करता।
सरकारें, स्कूल, प्रकाशक, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और डिजिटल मैप कंपनियां भविष्य में अपनी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग प्रोजेक्शन का इस्तेमाल कर सकती हैं।
मर्केटर प्रोजेक्शन भी तुरंत खत्म नहीं होगा, खासकर उन क्षेत्रों में जहां दिशा और कोणों की सटीकता महत्वपूर्ण है। दुनिया में रॉबिन्सन, विंकेल ट्रिपल, एकर्ट IV और दूसरे प्रोजेक्शन भी इस्तेमाल होते हैं।
यानी ‘Correct the Map’ का मतलब दुनिया की सीमाएं बदलना नहीं, बल्कि दुनिया को नक्शे पर अधिक वास्तविक अनुपात में दिखाने की कोशिश है। भारत के लिए इसका असर मुख्य रूप से दृश्य और तुलनात्मक होगा, भौगोलिक या राजनीतिक नहीं।














