Electoral Commission Powers: कैसे काम करता है भारत का चुनाव आयोग? जानिए शक्तियां, कार्यकाल और फैसले लेने का पूरा तरीका

भारत में लोकतंत्र की नीव को मजबूत रखने में भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जो देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की व्यापक शक्तियां दी गई हैं। यह संस्था देश में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं के साथ-साथ राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों के लिए चुनाव आयोजित कराती है।

तीन सदस्यीय निकाय और फैसलों का गणित

चुनाव आयोग एक तीन सदस्यीय संस्था है, जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो अन्य चुनाव आयुक्त (EC) शामिल होते हैं। आयोग को चलाने वाले इन तीनों शीर्ष अधिकारियों के पास निर्णय लेने के अधिकार पूरी तरह समान हैं। वर्ष 1995 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, तीनों आयुक्तों की शक्तियां बराबर हैं और आयोग का कोई भी निर्णय सर्वसम्मति (3-0) या बहुमत (2-1) के आधार पर ही लिया जाता है। जब भी मतदाताओं, राजनीतिक दलों या चुनाव प्रक्रिया में बदलाव से जुड़ा कोई नीतिगत फैसला होता है, तो उसे राज्यों में लागू करने की जिम्मेदारी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) की होती है। चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले पूरी हो) तक होता है।

जमीनी स्तर पर कैसे काम करती है चुनावी मशीनरी?

दिलचस्प बात यह है कि देश भर में इतने बड़े पैमाने पर चुनाव कराने वाले निर्वाचन आयोग के पास अपना कोई बहुत बड़ा स्थायी अमला नहीं होता है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान आयोग की शक्ति का विस्तार हो जाता है। राज्य स्तर पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जिला स्तर पर जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) और रिटर्निंग ऑफिसर (RO) की देखरेख में लाखों सरकारी कर्मचारी, शिक्षक और सुरक्षा बल प्रतिनियुक्ति (deputation) पर आयोग के सीधे नियंत्रण में काम करते हैं।

चुनाव की तारीखों से लेकर नतीजों तक: आयोग के प्रमुख कार्य

निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी केवल मतदान कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत से लेकर परिणाम घोषित होने तक हर पहलू को संभालना है।

  • मतदाता सूची और वोटर कार्ड: 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची में जोड़ना, उन्हें वोटर आईडी कार्ड जारी करना और सूचियों को समय-समय पर अद्यतन (update) करना।

  • चुनाव कार्यक्रम की घोषणा: चुनावों की तारीखें तय करना, नामांकन पत्र दाखिल करने, पत्रों की जांच, नाम वापसी और मतगणना की समय-सीमा निर्धारित करना।

  • दलों को मान्यता और चुनाव चिन्ह: नए राजनीतिक दलों का पंजीकरण करना, उन्हें राष्ट्रीय या राज्य स्तर की पार्टी का दर्जा देना और उम्मीदवारों व दलों को चुनाव चिन्ह आवंटित करना।

  • आदर्श आचार संहिता लागू करना: चुनाव की तारीखों के एलान के साथ ही आचार संहिता प्रभावी हो जाती है। यह नियम सत्ता के दुरुपयोग को रोकने और सभी दलों को समान अवसर देने के लिए बनाए गए हैं।

  • चुनावी खर्च पर निगरानी: प्रत्येक प्रत्याशी के लिए चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा तय करना और उस पर कड़ी नजर रखना ताकि धनबल से चुनाव प्रभावित न हो।

तीन शक्तियों से लैस है निर्वाचन आयोग

अपने संवैधानिक कर्तव्यों को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए निर्वाचन आयोग के पास तीन विशेष प्रकार की शक्तियां मौजूद हैं। पहली प्रशासनिक शक्ति, जिसके तहत आयोग चुनावी तंत्र पर नियंत्रण रखता है, गड़बड़ी की स्थिति में अधिकारियों के तबादले कर सकता है या किसी बूथ का चुनाव रद्द कर सकता है। दूसरी सलाहकार शक्ति, जिसके अंतर्गत सांसदों और विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामलों पर राष्ट्रपति या राज्यपाल को सलाह दी जाती है। तीसरी अर्ध-न्यायिक शक्ति, जिसके तहत यदि किसी राजनीतिक दल में विभाजन होता है, तो असली गुट की पहचान करने और चुनाव चिन्ह आवंटित करने का अंतिम फैसला आयोग ही करता है।

 

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