
नई दिल्ली देशभर में बीते एक साल से अधिक समय से चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। विपक्ष द्वारा लगातार उठाए जा रहे सवालों के बीच एक सनसनीखेज मीडिया रिपोर्ट ने इस पूरे मामले में आग में घी डालने का काम किया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और एसआईआर के बदलते नियमों पर आयोग के भीतर से ही स्वर मुखर हुए थे।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान करीब 14 बार एसआईआर से जुड़ी प्रक्रियाओं पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। इस खुलासे के बाद विपक्षी दलों ने हमला तेज करते हुए आरोप लगाया है कि दो सदस्यों वाले चुनाव आयोग में एसआईआर के कई अहम फैसलों पर सर्वसम्मति नहीं थी और मुख्य चुनाव आयुक्त ने एकतरफा फैसले लिए हैं। अब इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
चरणबद्ध तरीके से लागू हुआ एसआईआर: जानें किस राज्य में क्या है मौजूदा स्थिति
देशभर में एसआईआर की प्रक्रिया को तीन अलग-अलग चरणों में बांटा गया था। पहले चरण में बिहार के भीतर जून से सितंबर 2025 तक यह काम पूरा कर लिया गया। इसके बाद दूसरे चरण के तहत अक्तूबर 2025 से अप्रैल 2026 तक उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तमिलनाडु, केरल और गोवा समेत नौ राज्यों तथा पुदुचेरी, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण किया गया। इन क्षेत्रों में अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जा चुकी है, हालांकि पश्चिम बंगाल में हटाए गए नामों की अपीलों पर ट्रिब्यूनल्स के जरिए सुनवाई जारी है।
वहीं, मई 2026 से शुरू हुए तीसरे चरण में 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया। इनमें से मिजोरम, मणिपुर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और चंडीगढ़ में काम पूरा हो चुका है। जबकि महाराष्ट्र, दिल्ली, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड, नागालैंड, मेघालय, कर्नाटक, झारखंड, त्रिपुरा, दादरा-नगर हवेली और दमन-दीव में फिलहाल मसौदा सूची (ड्राफ्ट रोल) जारी कर दावे व आपत्तियां मांगी जा रही हैं। आंध्र प्रदेश में अंतिम सूची का प्रकाशन 3 अक्तूबर 2026 और नागालैंड में 22 नवंबर 2026 को होना तय है।
ड्राफ्ट रोल के आंकड़े चौंकाने वाले: महाराष्ट्र, दिल्ली और कर्नाटक में भारी संख्या में कटे नाम
मसौदा सूची के आंकड़ों पर नजर डालें तो कई राज्यों में वोटरों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। महाराष्ट्र में कुल 9.79 करोड़ वोटरों में से 2.06 करोड़ (21.1%) के नाम कट गए हैं, जिससे अब मतदाता संख्या 7.72 करोड़ रह गई है। कर्नाटक में 5.54 करोड़ में से 1.08 करोड़ (19.5%) नाम हटाए जाने के बाद 4.46 करोड़ वोटर बचे हैं। तेलंगाना में 3.38 करोड़ में से 73.40 लाख (21.7%) नाम कटे हैं।
सबसे बड़ा झटका राजधानी दिल्ली को लगा है, जहां 1.45 करोड़ वोटरों में से 47.60 लाख (32.8%) नाम हटा दिए गए हैं और अब केवल 97.50 लाख वोटर ही पंजीकृत हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश में 44.90 लाख (10.8%), झारखंड में 43.60 लाख (16.5%), हरियाणा में 34 लाख (16.4%), पंजाब में 20.70 लाख (9.6%), उत्तराखंड में 8.30 लाख (10.4%), मेघालय में 1.80 लाख (7.7%), नागालैंड में 1.60 लाख (11.7%) और दादरा-नगर हवेली व दमन-दीव में 1.27 लाख (29.7%) नाम मसौदा सूची से बाहर कर दिए गए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म-6 के जरिए पात्र मतदाताओं को फिर से जोड़ने का काम जारी है।
स्थानीय स्तर पर तीखा विरोध: कहीं त्योहारों में थमाए नोटिस तो कहीं 12 साल का इंतजार
एसआईआर प्रक्रिया को लेकर देश के विभिन्न राज्यों में प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर तीखा असंतोष देखने को मिल रहा है। पश्चिम बंगाल में हटाए गए 37 लाख से अधिक नामों की अपीलों को निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया कि मौजूदा 24 ट्रिब्यूनल की गति से इन्हें निपटाने में करीब 12 साल (146 महीने) लग जाएंगे।
महाराष्ट्र में विपक्षी दलों ने जन्माष्टमी, बैल पोला और गणेशोत्सव जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान सत्यापन कराने और देरी से नोटिस थमाने का आरोप लगाया है। दिल्ली में 47 लाख नाम हटने के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जहां बिना स्पष्ट कारण बताए लाखों लोगों को नोटिस जारी करने पर सवाल उठाए गए हैं। उत्तर प्रदेश में भी ड्राफ्ट लिस्ट से 2.89 करोड़ नाम हटने पर खुद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों हैरान रह गए थे, जिसके बाद बड़े पैमाने पर दोबारा नाम जोड़ने का काम करना पड़ा। इसके अतिरिक्त कर्नाटक, तेलंगाना और हरियाणा में भी मैपिंग न होने और फर्जी वोटरों के नाम पर असली नागरिकों के अधिकार छीनने के आरोप लगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: संवैधानिक अधिकार कायम, प्रक्रिया सुधारने के निर्देश
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव आयोग के निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक अधिकार पर मुहर लगाते हुए एसआईआर प्रक्रिया की कानूनी वैधता को सही ठहराया था। हालांकि, प्रक्रियागत कमियों और आम जनता को हो रही परेशानियों को देखते हुए शीर्ष अदालत लगातार नए दिशा-निर्देश दे रही है। पश्चिम बंगाल में पेंडिंग मामलों की बड़ी संख्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने ट्रिब्यूनल की संख्या 24 से बढ़ाकर 42 (लोकसभा सीटों के अनुसार) करने और न्यायिक अधिकारियों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ की अनुमति देने की सिफारिश की है, ताकि दावों का निपटारा तेजी से किया जा सके।















