
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रेल दुर्घटनाओं में मुआवजे के दावों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि किसी हादसे में जान गंवाने वाले या घायल यात्री के पास से ट्रेन का टिकट बरामद न होना उसके परिवार के मुआवजे के दावे को खारिज करने की वजह नहीं बन सकता। अदालत ने 2017 में गुजरात में चलती ट्रेन से गिरकर दम तोड़ने वाले एक युवक के माता-पिता को दिए गए 8 लाख रुपये के मुआवजे को बहाल कर दिया है।
गुजरात हाईकोर्ट का फैसला रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने माना वास्तविक यात्री
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसने रेलवे दावों से जुड़े इस मुआवजे को खारिज कर दिया था। यह मामला महेशभाई नाम के युवक से जुड़ा है, जो 27 सितंबर 2017 को अहमदाबाद के रास्ते सूरत जा रहे थे। ट्रेन में अचानक झटका लगने से वह सामान्य डिब्बे से नीचे गिर गए थे और करीब एक महीने इलाज के बाद 31 अक्टूबर 2017 को उनकी मृत्यु हो गई थी।
‘अस्पताल में जिंदगी से जूझते वक्त टिकट संभालना व्यावहारिक नहीं’
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि हाईकोर्ट ने टिकट न मिलने के तथ्य को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी। पीठ ने टिप्पणी की कि जब कोई पीड़ित एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहकर जिंदगी और मौत से जूझ रहा हो, तो ऐसे समय में परिजनों से टिकट संभालकर रखने की उम्मीद करना बिल्कुल असंभावित है। पीड़ित के पिता ने शपथ पत्र में स्पष्ट किया था कि उनके बेटे का टिकट, घड़ी, रुमाल और नकदी हादसे में खो गए थे।
देरी से बनी जांच रिपोर्ट का फायदा रेलवे को नहीं मिलेगा
अदालत ने रेलवे की जांच प्रक्रिया पर भी कड़ा रुख अपनाया। पीठ ने कहा कि घटना के करीब सात महीने बाद (17 मई 2018) तैयार की गई रेलवे की जांच रिपोर्ट को परिजनों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जांच में हुई इस देरी के लिए पीड़ितों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। रेलवे के गवाह भी यह साबित नहीं कर सके कि मृतक यात्री के पास टिकट नहीं था, जबकि परिजनों ने शपथ पत्र देकर अपनी शुरुआती जिम्मेदारी पूरी कर दी थी।
30 दिनों के भीतर 8 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण (RCT) के 17 जून 2022 के उस मूल फैसले को सही ठहराया, जिसमें रेल अधिनियम 1989 की धारा 124-A के तहत 8 लाख रुपये का मुआवजा और उस पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने रेलवे प्रशासन को आदेश दिया है कि वह यह तय राशि 30 दिनों के भीतर मृतक के माता-पिता को भुगतान करे।















