‘रील्स’ आंदोलन बनाम संवैधानिक पद: CJP के मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग के पीछे का पूरा सच, समझिए इनसाइड स्टोरी

 नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सर्वेसर्वा अभिजीत दीपके ने महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली चुनाव नतीजों का पूरा ठीकरा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के सिर फोड़ दिया है। हालांकि, सोशल मीडिया पर ‘फैक्ट चेकर्स’ तुरंत सक्रिय हो गए और यह तर्क देने लगे कि ये तीनों चुनाव तो ज्ञानेश कुमार की मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर नियुक्ति से बहुत पहले संपन्न हुए थे।

लेकिन चुनावी राजनीति और विरोध प्रदर्शनों की दुनिया को समझने वाले जानते हैं कि हमारे देश में कोई भी आंदोलन किसी ‘ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स’ (BIS) से क्वालिटी चेक की मुहर लगवाकर शुरू नहीं होता।

लॉजिक से परे केवल एजेंडे का खेल सार्वजनिक प्रदर्शनों और सियासी रैलियों में ठोस लॉजिक की तलाश करना वैसा ही है जैसे जलेबी में सीधा सिरा ढूंढना। अतीत में भी सुप्रीम कोर्ट में लंबी बहस और गवाहियों के बाद अफजल गुरु को मिली सजा पर ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं…’ जैसे नारे लगते रहे हैं। जब किसी व्यवस्था या संवैधानिक संस्था के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने का फैसला कर लिया जाता है, तब मुद्दों की गहराई, सही क्रोनोलॉजी और जमीनी सच्चाई पीछे छूट जाती है; केवल तय एजेंडा ही मुख्य मंच पर रहता है।

सवाल यह नहीं है कि CJP ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा क्यों मांग रही है, जबकि यह मुद्दा मूल रूप से मुख्य विपक्षी दलों का था जो ‘चुनाव लीक’ के दावों से प्रभावित महसूस कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि CJP चाहती तो अपना प्रदर्शन सीधे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से शुरू कर सकती थी, जहां चुनाव आयोग से लेकर तमाम प्रमुख विपक्षी दलों के मुख्यालय स्थित हैं। इसके बजाय, उन्होंने मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क को चुना। मुंबई में एक सफल शो के बाद अब ऐलान किया गया है कि इस पूरी मुहिम का ‘सीजन-2’ 10 अक्टूबर को दिल्ली की सड़कों पर देखने को मिलेगा।

CJP की चालाक डिजिटल रणनीति: “जहां कीवर्ड, वहां हम” CJP की कार्यशैली में एक सोची-समझी डिजिटल रणनीति दिखाई देती है—”जहां ट्रेंडिंग कीवर्ड, वहीं हमारी मौजूदगी”। नीट पेपर लीक मामले में सफलता पाने के बाद, जब उनका पुराना ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान सोशल मीडिया की दुनिया में ठंडा पड़ने लगा, तो उन्होंने तुरंत उस वक्त के सबसे गरमा-गरम और ट्रेंडिंग कीवर्ड ‘SIR’ और ‘चुनाव आयोग’ पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

विपक्ष जब तक इस मुद्दे पर कोई साझा रणनीति बनाता, उससे पहले ही CJP ने एजेंडे पर कब्जा कर लिया और सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग बुलंद कर दी। CJP ने केवल चुनाव आयोग पर ही हमला नहीं बोला, बल्कि विपक्षी दलों के दोहरे रवैये पर भी सवाल उठाए। उनका सीधा तर्क है कि अगर चुनाव प्रणाली में इतनी ही गड़बड़ी है, तो विपक्षी नेता चुनाव का पूरी तरह से बहिष्कार क्यों नहीं करते? पर्चा क्यों भरते हैं? इस एक आक्रामक बयानबाजी से CJP ने खुद को चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया पर सबसे मुखर और निडर रुख रखने वाले एकमात्र समूह के रूप में पेश करने की कोशिश की है।

विपक्षी दलों और CJP के रास्तों में क्यों है दूरी? मुद्दा एक जैसा दिखने के बावजूद CJP का यह प्रदर्शन मुख्य विपक्षी पार्टियों के साथ कभी भी औपचारिक गठबंधन में तब्दील नहीं हो सकता। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि CJP कोई मान्यता प्राप्त या रजिस्टर्ड राजनीतिक दल नहीं है। कानूनन, चुनाव आयोग का संवैधानिक दायरा केवल पंजीकृत और मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों से संवाद करने का है, किसी अनरजिस्टर्ड प्रेशर ग्रुप से नहीं।

दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य राष्ट्रीय विपक्षी दल संसदीय प्रक्रियाओं और कानूनी रास्तों की सीमाओं को समझते हैं। वे CJP के इस आक्रामक और मुख्य रूप से सोशल मीडिया ‘मीम्स’ व ‘रील्स’ तक सीमित आंदोलन से एक सुरक्षित दूरी बनाकर चल रहे हैं, ताकि उन पर किसी असंसदीय या अराजक तत्व का ठप्पा न लगे। स्वयं CJP द्वारा विपक्षी दलों के साथ मंच साझा न करने की घोषणा के बाद दोनों के रास्ते पूरी तरह अलग नजर आते हैं।

ज्ञानेश कुमार और धर्मेंद्र प्रधान के मामलों में जमीन-आसमान का फर्क NEET विवाद के दौरान धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मिसाल देकर ज्ञानेश कुमार को कुर्सी से हटाने का गणित लगाना संवैधानिक दृष्टि से सही नहीं है। धर्मेंद्र प्रधान वाले मामले में देश भर के लाखों छात्रों का सीधा असंतोष जुड़ा था और सोनम वांगचुक जैसे गंभीर चेहरों के अनशन ने उसे नैतिक बल दिया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि धर्मेंद्र प्रधान एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि थे, जिनका राजनीतिक पद जनभावनाओं और चुनावी समीकरणों के अधीन था।

इसके विपरीत, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार किसी राजनीतिक दल की कृपा से नहीं, बल्कि एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था के प्रमुख के तौर पर नौकरशाही के रास्ते इस पद तक पहुंचे हैं। उनका पद सोशल मीडिया ट्रेंड्स, रील्स या जनभावनाओं के तात्कालिक दबाव से तय नहीं होता। भारतीय संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का एकमात्र रास्ता संसद के माध्यम से चलाई जाने वाली जटिल महाभियोग (Impeachment) प्रक्रिया ही है।

हालांकि, राजनीति और प्रशासनिक फैसलों में अनिश्चितता हमेशा बनी रहती है। ‘मोदी सरकार के सरप्राइज’ का इतिहास रहा है, जहां कई बड़े फैसले अंतिम क्षणों में सामने आते हैं, लेकिन संवैधानिक सीमाओं के तहत किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना कागजी और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है।

 

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