
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों और उनके इस्तीफे की मांग के बीच मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। याचिका में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों को कथित तौर पर एकतरफा तरीके से लिए जाने का आरोप लगाया गया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है।
हालांकि, अदालत ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या तत्काल निलंबित करने का कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है। सुनवाई के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत सस्पेंड करने की मांग को अदालत ने असामान्य बताया। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट जांच लंबित रहने के दौरान CEC को पद से हटा या निलंबित कर सकता है?
क्या सुप्रीम कोर्ट CEC को सस्पेंड कर सकता है?
संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे पद से हटाने या निलंबित करने की कोई विशेष शक्ति नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिस प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है।
इसका मतलब है कि केवल किसी याचिका में आरोप लगाए जाने से CEC अपने आप पद से नहीं हटते। CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया में संसद की भूमिका होती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के फैसलों और उसके कामकाज की न्यायिक समीक्षा कर सकता है। यदि आयोग का कोई फैसला संविधान या कानून के खिलाफ पाया जाता है, तो अदालत उस फैसले को रद्द या निरस्त कर सकती है।
CEC को हटाने की क्या है प्रक्रिया?
मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संविधान के तहत एक महत्वपूर्ण और संरक्षित पद है। अनुच्छेद 324(5) में CEC को हटाने के लिए कड़ी प्रक्रिया का प्रावधान है।
CEC को हटाने के लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाती है, जो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाने के लिए निर्धारित है। इसलिए किसी आरोप, शिकायत या याचिका के आधार पर अदालत सीधे CEC को पद से हटाने का आदेश नहीं देती।
मौजूदा मामले में याचिकाकर्ताओं ने जांच पूरी होने तक ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने और उनके कथित एकतरफा फैसलों की जांच कराने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मांग पर कोई अंतरिम राहत नहीं दी है और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने चुनाव आयोग के फैसलों और उसकी निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कुछ फैसले जरूरी संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया में अन्य सदस्यों की भागीदारी के बिना लिए गए।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि जब तक मामले की जांच पूरी नहीं होती, तब तक ज्ञानेश कुमार को कुछ विवादित शक्तियों के इस्तेमाल से अस्थायी रूप से रोका जाए।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है। आयोग में फैसले संभव हो तो सर्वसम्मति से और मतभेद की स्थिति में कानून के अनुसार बहुमत से लिए जाते हैं।
2023 के कानून में क्या प्रावधान है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 में आयोग के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार, आयोग को जहां तक संभव हो, अपने फैसले सर्वसम्मति से लेने चाहिए। यदि CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद होता है, तो फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाता है।
इसी प्रावधान के आधार पर मौजूदा विवाद में सवाल उठाए जा रहे हैं कि चुनाव आयोग के जिन फैसलों को याचिका में चुनौती दी गई है, वे निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिए गए थे या नहीं।
CEC की भूमिका क्या होती है?
संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को देश में चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी देता है। मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग के अध्यक्ष के रूप में काम करते हैं, लेकिन चुनाव से जुड़े अधिकार केवल व्यक्तिगत रूप से CEC के पास नहीं होते।
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और इसमें अन्य चुनाव आयुक्तों की भी भूमिका होती है। इसलिए आयोग के फैसलों में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाती है।
टीएन शेषन के मामले का भी जिक्र
मौजूदा विवाद में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया गया है। उस मामले में बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की प्रकृति और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर विचार किया गया था।
अदालत ने चुनाव आयोग के सामूहिक स्वरूप और बहुमत से निर्णय लेने के सिद्धांत से जुड़े पहलुओं पर विचार किया था। इसी व्यवस्था का संदर्भ मौजूदा मामले में भी दिया जा रहा है।
ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
याचिका में चुनाव आयोग के 14 फैसलों को कथित तौर पर एकतरफा तरीके से लिए जाने का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इन फैसलों को रद्द करने, विशेष जांच दल (SIT) से जांच कराने और चुनाव आयोग से जुड़े दस्तावेजों की जांच की अनुमति देने की मांग की है।
इसके अलावा याचिका में मांग की गई है कि जांच पूरी होने तक ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड किया जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आयोग के फैसले केवल मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले नहीं ले सकते और निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
पुराने केरल मामले का भी जिक्र
याचिका और उससे जुड़ी चर्चाओं में ज्ञानेश कुमार से जुड़े एक पुराने मामले का भी उल्लेख किया गया है। यह मामला करीब दो दशक पुरानी केरल की एक सड़क परियोजना से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोपों के अनुसार, उस समय ज्ञानेश कुमार केरल में लोक निर्माण विभाग के सचिव थे।
यह मामला अंगामली से तिरुवनंतपुरम तक सड़क के अपग्रेडेशन के लिए मंजूर परियोजना और उससे जुड़ी कथित अनियमितताओं से संबंधित बताया गया है। हालांकि, इस पुराने मामले के आरोपों और मौजूदा चुनाव संबंधी याचिका को अलग-अलग संदर्भों में देखना जरूरी है।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाने या सस्पेंड करने का आदेश नहीं दिया है। अब मामले की आगे की सुनवाई में अदालत याचिका में लगाए गए आरोपों और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े कानूनी सवालों पर विचार करेगी।

















