ब्राजील की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है और देश के दिग्गज नेता लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा ने चुनावी मैदान में ऐतिहासिक व धमाकेदार जीत दर्ज करते हुए सनसनी फैला दी है। अमेरिका के तीखे विरोध और तमाम जटिल राजनीतिक समीकरणों को धता बताते हुए लूला डा सिल्वा ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो को करारी शिकस्त दी है और चौथी बार देश की बागडोर अपने हाथों में मजबूती से थाम ली है। इस अप्रत्याशित और शानदार जीत के बाद से ही लैटिन अमेरिका से लेकर सीधे वाशिंगटन तक सियासी हलचल बेहद तेज हो गई है तथा वैश्विक राजनीति के गलियारों में इस चुनाव परिणाम की चर्चा जोरों पर है।
अमेरिका पर तीखा हमला, दो टूक अंदाज में कहा- ब्राजील किसी की बपौती नहीं
चुनावी मैदान में महाविजेता बनने के तुरंत बाद लूला डा सिल्वा के तेवर पूरी तरह से आक्रामक नजर आए और उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे तौर पर अमेरिका पर जोरदार सियासी निशाना साधा। उन्होंने देश की जनता को संबोधित करते हुए दो टूक अंदाज में स्पष्ट किया कि ब्राजील किसी की जागीर या बपौती नहीं है और यह स्वाभिमानी देश कभी भी किसी दूसरे बाहरी राष्ट्र के इशारे पर नहीं चलने वाला है। अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लूला का यह कड़ा बयान सीधे तौर पर अमेरिकी नीतियों और पूर्व में लूला के खिलाफ लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ का बेहद करारा जवाब है। चुनाव प्रचार के दौरान भी इस दिग्गज नेता ने लगातार इस बात पर पुरजोर जोर दिया था कि ब्राजील को अपने आंतरिक और बाहरी सभी फैसले खुद लेने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए।
कांटे की टक्कर वाले रोमांचक मुकाबले में बोल्सोनारो को चटाई धूल
यह पूरा चुनावी मुकाबला बेहद कड़ा और सांसें रोक देने वाली कांटे की टक्कर वाला रहा, जिसमें आखिरकार लूला डा सिल्वा ने अपने कड़े प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो को लगभग 44 लाख वोटों के भारी-भरकम अंतर से पीछे छोड़ दिया। हालांकि, चुनाव के पहले दौर के मतदान में बोल्सोनारो को 47 प्रतिशत और लूला को 45 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे, जिसके चलते यह मुकाबला बेहद रोमांचक और अनिश्चितता से भर गया था। इसके बाद अनुभवी लूला ने रणनीतिक रूप से देश के युवाओं से सीधा संपर्क साधा और अपने चुनाव प्रचार के दौरान देश की बढ़ती महंगाई, खाद्य पदार्थों के महंगे दाम और अपराध जैसे गंभीर मुद्दों को मुख्य हथियार बनाया, जिस पर जनता ने भरोसा जताते हुए एक बार फिर उन्हें सिर आंखों पर बैठा लिया।
वोटिंग के वक्त को लेकर हुआ जबरदस्त विवाद और मचा सियासी हंगामा
मतदान प्रक्रिया के दौरान उस वक्त भारी ड्रामा और असमंजस देखने को मिला जब वोटिंग खत्म होने से ठीक तीन मिनट पहले सुप्रीम कोर्ट के एक विशेष आदेश के चलते मतदान के समय को अचानक दो घंटे के लिए बढ़ा दिया गया। इस चौंकाने वाले फैसले के पीछे मुख्य तौर पर साओ पाउलो और साल्वाडोर शहरों में मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने वाली बसों की भारी कमी और दक्षिणी ब्राजील में हुई मूसलाधार बारिश का हवाला दिया गया था। हालांकि, इस फैसले को लेकर देश में तीखा विवाद छिड़ गया और चुनाव में पराजित हुए खेमे ने इसे पूरी तरह अस्वीकार्य बताते हुए इन परिणामों को कानूनी रूप से अदालत में चुनौती देने और पूरे नतीजे रद्द कराने की मांग तक उठा दी।
संघर्षों और जेल की सजा से निकलकर तय किया ऐतिहासिक राजनीतिक सफर
करीब 81 वर्ष की उम्र में अमेरिका महाद्वीप के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपतियों में अपनी खास जगह बनाने वाले लूला डा सिल्वा का पूरा राजनीतिक सफर संघर्षों, उतार-चढ़ाव और संघर्ष की एक लंबी दास्तान रहा है। 1970 के दशक में एक आम मजदूर संगठन के कद्दावर नेता के रूप में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले लूला ने देश की चर्चित वर्कर्स पार्टी की स्थापना में बेहद अहम भूमिका निभाई थी। इससे पहले वह देश की बागडोर वर्ष 2002 और 2006 में भी राष्ट्रपति के रूप में संभाल चुके हैं। भ्रष्टाचार के कई मामलों और जेल की लंबी सजा झेलने के बाद सर्वोच्च अदालत द्वारा राहत मिलने के बाद उनका यह राजनीतिक कमबैक पूरी दुनिया की राजनीति में एक मिसाल बन चुका है, और उनका यह नया ऐतिहासिक कार्यकाल आगामी 5 जनवरी 2027 से आधिकारिक रूप से शुरू होगा।



















