शारदीय या चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और व्रत रखने के दौरान कई बार अनजाने में कुछ त्रुटियां हो जाती हैं. पूजा की सही विधि का ज्ञान न होना, मंत्रों के उच्चारण में अशुद्धि रह जाना या किसी पूजा सामग्री का छूट जाना एक आम बात है. ऐसे में कई बार भक्तों के मन में यह चिंता सताने लगती है कि क्या इन अनजानी गलतियों की वजह से उनकी पूजा अधूरी रह गई?
धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां जगत जननी ममता की मूरत हैं और वे अपने भक्तों की हर गलती को क्षमा कर देती हैं. इसलिए, व्रत का पारण करने और हवन या कन्या पूजन संपन्न करने से पहले ‘श्री देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र’ का पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है.
क्या है श्री देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र का महत्व?
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र (जिसे दुर्गा क्षमा प्रार्थना भी कहा जाता है) भक्त और मां दुर्गा के बीच अटूट प्रेम, समर्पण और क्षमा-याचना का सबसे सुंदर माध्यम है.
इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता है कि उसे न तो मंत्रों का ज्ञान है, न यंत्रों की जानकारी और न ही सही ढंग से आह्वान या ध्यान करना आता है. वह मां से कहता है कि हे दुर्गे! अज्ञानता, आलस्य या अभाव के कारण पूजा में जो भी त्रुटि हुई हो, एक माता होने के नाते आप अपने इस ‘कुपुत्र’ को क्षमा कर दें. मान्यता है कि नवरात्रि की पूर्णाहुति पर इस स्तोत्र का पाठ करने से मन को शांति मिलती है और माता रानी साधक की सभी भूलों को माफ करके उसकी पूजा को पूर्ण स्वीकार करती हैं.
॥ श्री देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम् ॥
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा: ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ 1 ॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूद ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 2 ॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुत: ।
मदीयोऽयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 3 ॥
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 4 ॥
परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ 5 ॥
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै: ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ 6 ॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति: ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ 7 ॥
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन: ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत: ॥ 8 ॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारै:
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि: ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ 9 ॥
आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा:
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ 10 ॥
जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ 11 ॥
मत्सम: पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथा योग्यं तथा कुरु ॥ 12 ॥
पाठ करने के जरूरी नियम
-
कब करें पाठ: व्रत का पारण करने से ठीक पहले, हवन या अंतिम आरती के समय इस स्तोत्र का पाठ करना सबसे उत्तम माना जाता है.
-
भाव और श्रद्धा: पाठ करते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और पश्चाताप का भाव रखें. मां से यह प्रार्थना करें कि अज्ञानतावश हुई गलतियों के लिए वे आपको क्षमा करें.


















