
नागोया (जापान) में खेले जा रहे एशियन गेम्स 2026 के 14वें दिन कुश्ती के अखाड़े से भारत के लिए बेहद शानदार खबर आई है। पेरिस ओलंपिक 2024 के ब्रॉन्ज मेडल विजेता और भारत के स्टार पहलवान अमन सहरावत ने पुरुषों के 57 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में स्वर्ण पदक (Gold Medal) जीतकर इतिहास रच दिया। बेहद रोमांचक और कांटे के खिताबी मुकाबले में अमन ने उत्तर कोरिया के मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन हान चोंग-सोंग को 11-7 के अंतर से शिकस्त देकर एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल अपने नाम किया।
आखिरी मिनट के हाई-वोल्टेज ड्रामे में पलटा मुकाबला
फाइनल मुकाबले का रोमांच दर्शकों की सांसें थाम देने वाला रहा। मैच की शुरुआत से ही दोनों पहलवानों के बीच जबर्दस्त टक्कर देखने को मिली, लेकिन अमन ने अपनी पारंपरिक फुर्ती दिखाते हुए पहला अंक हासिल कर बढ़त बनाई। मैच में आए एक इंजरी ब्रेक के तुरंत बाद अमन ने अपने आक्रमण को और तेज किया और देखते ही देखते स्कोर को 6-1 कर दिया। हालांकि, इसके बाद उत्तर कोरियाई पहलवान हान चोंग-सोंग ने जबर्दस्त वापसी की। उन्होंने अमन को मैट पर पिन करते हुए लगातार अंक बटोरे और मैच में अचानक बढ़त बना ली। जब मैच खत्म होने में एक मिनट से भी कम समय बचा था, तब अमन ने हार न मानने का जज्बा दिखाया और विरोधी को मैट पर लॉक करके लगातार अंक जुटाए और 11-7 के अंतर से ऐतिहासिक जीत हासिल कर ली।
हांगझू का ब्रॉन्ज नागोया में बदला ‘गोल्ड’ में; भारत का कुश्ती में चौथा मेडल
एशियन गेम्स के इतिहास में अमन सहरावत का यह लगातार दूसरा पदक है। इससे पहले उन्होंने हांगझू एशियन गेम्स में इसी 57 किलो कैटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया था, जिसे अब उन्होंने नागोया में सोने में बदल दिया है। जारी एशियन गेम्स 2026 में सुजीत कलकल के स्वर्ण पदक के बाद फ्रीस्टाइल कुश्ती में भारत का यह दूसरा गोल्ड मेडल है, जबकि कुल मिलाकर कुश्ती के अखाड़े से भारत को मिला यह चौथा मेडल है।
अनाथ होने के गम और डिप्रेशन को पछाड़कर बने विश्व विजेता
16 जुलाई 2003 को हरियाणा के झज्जर जिले के बिरोहड़ गांव में जन्मे अमन सहरावत की यह सफलता उनके अदम्य साहस और जुझारूपन की मिसाल है। बचपन में मिट्टी के अखाड़े से शुरुआत करने वाले अमन 2012 लंदन ओलंपिक में सुशील कुमार के मेडल से प्रेरित होकर 10 साल की उम्र में दिल्ली के प्रसिद्ध छत्रसाल स्टेडियम पहुंचे थे। महज 11 वर्ष की उम्र में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया, जिसके बाद वे अनाथ हो गए। माता-पिता को खोने के बाद भारी मानसिक तनाव और डिप्रेशन से जूझ रहे अमन को उनके चाचा सुधीर और परिवार ने संभाला। अमन ने अपने पूरे दर्द को कुश्ती के मैट पर ढाल दिया और छत्रसाल में कोच ललित कुमार के मार्गदर्शन में दांव-पेंच सीखकर आज विश्व पटल पर भारत का तिरंगा लहरा रहे हैं।

















