बदायूं : डेढ़ साल के मासूम आरव को सड़क पर पटक-पटककर मार डालने वाले दरिंदे विराज उर्फ जितेंद्र पाठक को जिला जज की अदालत ने मौत की सजा सुना दी है। कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद जहां एक तरफ कानून की जीत हुई है, वहीं दूसरी तरफ पीड़ित मां का कलेजा आज भी अपने लाल की तड़प को याद कर छलनी है।
अदालत परिसर से लेकर मासूम के ननिहाल बामई तक हर आंख नम थी। फैसले के बाद आरव की मां रति शर्मा का दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला। रुंधे गले से रति ने कहा, “अदालत ने फांसी की सजा सुनाकर न्याय तो कर दिया, लेकिन मेरी आत्मा को शांति तब मिलेगी जब उस दरिंदे को मेरी आंखों के सामने फांसी के फंदे पर लटकाया जाएगा। मैं उसकी मौत का मंजर खुद देखना चाहती हूं।”
शादी का प्रस्ताव ठुकराने पर फुफेरे भाई ने ढाया था कहर
मासूम आरव की नानी पिंकी देवी कोर्ट परिसर में ही फूट-फूटकर रो पड़ीं। बामई स्थित अपने मायके में मौजूद रति शर्मा ने रोते हुए उस काली दोपहर को याद किया, जिसने उनका संसार उजाड़ दिया था। रति ने बताया कि उनके ही रिश्ते के फुफेरे भाई विराज ने शादी का प्रस्ताव रखा था। जब रति ने इसे ठुकरा दिया, तो प्रतिशोध की आग में जल रहे विराज ने डेढ़ साल के मासूम को निशाना बनाया। रति ने कहा, “आरव ने तो अभी ठीक से बोलना भी नहीं सीखा था, वह सिर्फ अपनी मां को पहचानता था। जैसी तड़प मेरे बच्चे ने झेली, वैसी ही तड़प इस हत्यारे को भी मिलनी चाहिए।”
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा: पहली ही पटक में टूट गई थी मासूम की गर्दन
आरव की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जो खुलासे हुए, उसने डॉक्टरों की टीम के भी रोंगटे खड़े कर दिए थे। रिपोर्ट के अनुसार, बच्चे के शरीर पर बाहर खून का एक कतरा तक नहीं था, लेकिन अंदरूनी तबाही खौफनाक थी। पहली ही पटक में आरव के सिर (स्कैल्प) के सारे जोड़ खुल गए थे और वह बेसुध हो गया था। दूसरी या तीसरी पटक में उसकी सांसें थम गईं। दरिंदगी का आलम यह था कि बच्चे की गर्दन की हड्डी और छाती की सभी पसलियां पूरी तरह चकनाचूर हो चुकी थीं।
’20-21 लाख ले लो और एक्सीडेंट बता दो’- हत्यारे का ऑडियो आया था सामने
वारदात को अंजाम देकर भागने के बाद हत्यारा विराज कानून के फंदे से बचने के लिए छटपटाने लगा था। उसने रति के नोएडा निवासी मौसा पंकज शर्मा को फोन कर रुपयों का लालच दिया। सवा दो मिनट के इस ऑडियो में वह गिड़गिड़ाते हुए कह रहा था, “गलती हो गई, मेरे घर पर 20-21 लाख रुपये कैश रखे हैं, वो आप ले लो। पुलिस से कह देना कि यह महज़ एक एक्सीडेंट था।” इतना ही नहीं, उसने अपने राजनीतिक रसूख की धौंस देने की भी कोशिश की थी, लेकिन परिवार ने यह ऑडियो पुलिस को सौंपकर उसके सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया।
अपनों की बेरुखी: न जन्म पर आए, न मौत पर और न फैसले के दिन
मासूम आरव की किस्मत में अपनों का साया नहीं था। रति ने बताया कि दहेज प्रताड़ना के कारण वह गर्भावस्था के दौरान ही मायके आ गई थीं। आरव का जन्म ननिहाल में हुआ, लेकिन बदायूं में रहने वाले उसके पिता सुमित कुमार या ससुराल का कोई सदस्य उसका मुंह देखने तक नहीं आया। क्रूरता की हद तो तब हो गई जब आरव की हत्या हुई, तब भी पिता या ससुराल पक्ष से कोई शव को देखने नहीं पहुंचा। अंततः ननिहाल वालों ने ही गमगीन माहौल में उसका अंतिम संस्कार किया। शुक्रवार को जब अदालत का ऐतिहासिक फैसला आना था, तब भी पिता की तरफ से कोई झांकने तक नहीं आया।
कप्तान के वादे पर खरे उतरे विवेचक, रिकॉर्ड 6 दिन में दाखिल की चार्जशीट
इस मामले में पुलिस की तत्परता मिसाल बन गई है। एसएसपी आदित्य लांग्हे ने इस केस को एक नजीर बनाने का संकल्प लिया था। उन्होंने जांच टीम को 15 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल करने और फास्ट ट्रैक मोड में ट्रायल पूरा कराने का टास्क दिया था। इंस्पेक्टर अनुज कुमार इस चुनौती पर पूरी तरह खरे उतरे। उन्होंने वारदात के महज 6 दिनों के भीतर कोर्ट में अकाट्य साक्ष्यों के साथ चार्जशीट दाखिल कर दी।
जिला जज डॉ. बब्बू सारंग की अदालत में 15 जून से गवाहियां शुरू हुईं। अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने 13 मजबूत गवाह पेश किए। इसी प्रभावी और त्वरित पैरवी का परिणाम रहा कि अदालत ने सभी साक्ष्यों को पुख्ता मानते हुए नरपिशाच विराज को फांसी के फंदे तक पहुंचा दिया।








