Israel Politics: बेंजामिन नेतन्याहू के सबसे बड़े विरोधी बने गादी आइजनकोट, जानें 5 पॉइंट्स में उनकी सख्त विदेश नीति और रणनीति

मुख्य बिंदु:

  • गठबंधन की 61 सीटें मिलने पर इजरायल के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट।

  • हमास का सफाया, ईरान पर आर्थिक व सैन्य दबाव और वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के विस्तार के समर्थक।

  • मंसूर अब्बास की राम (Ra’am) पार्टी ने समर्थन देने की घोषणा की, लेकिन हमास को आतंकी संगठन कहने से किया इनकार।

इजरायल की राजनीति में गादी आइजनकोट (Gadi Eisenkot) प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सबसे बड़े और मजबूत राजनीतिक विरोधी के रूप में उभरे हैं। यदि उनका विपक्षी गठबंधन संसद (Knesset) में 61 सीटों का जादुई आंकड़ा जुटा लेता है, तो वह देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं।

आइजनकोट इजरायली रक्षा बलों (IDF) के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। गाजा युद्ध शुरू होने पर वह नेतन्याहू की आपातकालीन सरकार और युद्ध कैबिनेट में शामिल थे, लेकिन जून 2024 में मतभेदों के चलते उन्होंने सरकार से इस्तीफा दे दिया था। यद्यपि वह नेतन्याहू की युद्ध नीति की कड़ी आलोचना करते हैं, लेकिन गाजा, हमास, ईरान और फिलिस्तीन के मुद्दे पर उनका अपना रुख बेहद कड़ा है। आइए 5 मुख्य पॉइंट्स में समझते हैं गादी आइजनकोट की सोच और उनकी भावी नीतियां।

1. हमास का पूर्ण सफाया चाहते हैं आइजनकोट

आइजनकोट हमास को इजरायल की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष खतरा मानते हैं। उनका स्पष्ट रुख है कि गाजा से हमास के राजनीतिक शासन और सैन्य बुनियादी ढांचे को जड़ से खत्म करना बेहद जरूरी है। सितंबर 2026 में दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने अपनी भावी सरकार की शर्त स्पष्ट करते हुए कहा था कि जो राजनीतिक दल हमास को आतंकवादी संगठन नहीं मानता और उसके खात्मे का समर्थन नहीं करता, वह उनके गठबंधन में शामिल नहीं हो सकता। हालांकि, उनका मानना है कि केवल सैन्य कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थायी समाधान के लिए कूटनीतिक रणनीतियों का सहारा लेना भी आवश्यक है।

2. ईरान को मानते हैं सबसे बड़ी बाहरी सुरक्षा चुनौती

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को आइजनकोट इजरायल के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। वह किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना चाहते हैं। ईरान को पीछे हटने पर मजबूर करने के लिए वह लगातार सैन्य हमलों के बजाय सख्त अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि, जरूरत पड़ने पर वह ईरान के परमाणु ठिकानों पर लक्षित सैन्य हमलों के भी पक्षधर हैं, लेकिन ईरान में तख्तापलट या सत्ता परिवर्तन को व्यावहारिक लक्ष्य नहीं मानते।

3. दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) के सख्त खिलाफ

फिलिस्तीन के मुद्दे पर आइजनकोट का रुख नेतन्याहू से अलग नहीं है। वह वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा को मिलाकर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश बनाने यानी ‘दो-राष्ट्र समाधान’ के विचार के सख्त विरोधी हैं। वह वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों (Jewish Settlements) के विस्तार का खुलकर समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि यहूदी बस्तियां इजरायल के ऐतिहासिक और सुरक्षा हितों से जुड़ी हैं, हालांकि ये बस्तियां कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में बनाई जानी चाहिए।

4. ‘दहिया डॉक्ट्रिन’ (Dahiya Doctrine) के जनक

इजरायली सेना की चर्चित और विवादित ‘दहिया डॉक्ट्रिन’ को तैयार करने में आइजनकोट की मुख्य भूमिका रही है। यह रणनीति 2006 में लेबनान के बेरूत स्थित दहिया इलाके में हिजबुल्लाह के खिलाफ की गई भारी तबाही के बाद अस्तित्व में आई थी, जब आइजनकोट उत्तरी कमान के प्रमुख थे। इस नीति के तहत, जिन नागरिक इलाकों या गांवों से इजरायल पर हमले किए जाएंगे, उन्हें सैन्य अड्डा माना जाएगा और वहां व्यापक तबाही मचाने वाली भारी सैन्य ताकत का प्रयोग किया जाएगा। मार्च 2026 में भी उन्होंने इस कड़े रुख को दोहराने की मांग की थी।

5. गाजा युद्ध में बेटों को खोया, नेतन्याहू की रणनीति पर उठाए सवाल

अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने पर आइजनकोट बिना विभाग के मंत्री के रूप में युद्ध कैबिनेट का हिस्सा बने, लेकिन जून 2024 में बेनी गैंट्ज के साथ सरकार से अलग हो गए। उन्होंने नेतन्याहू पर युद्ध को सही तरीके से न चलाने और राष्ट्रीय सुरक्षा के ऊपर अपने राजनीतिक हितों को रखने का आरोप लगाया। इस गाजा युद्ध के दौरान आइजनकोट ने अपने एक बेटे और दो भतीजों को खो दिया। इससे पहले 2018 में ‘ग्रेट मार्च ऑफ रिटर्न’ के दौरान भी वह सेना प्रमुख थे, जहां इजरायली कार्रवाई में 189 फिलिस्तीनियों की मौत हुई थी।

सरकार बनाने के लिए हमास पर अड़ी शर्त, मंसूर अब्बास के साथ फंसा पेंच

प्रधानमंत्रित्व पद की रेस में आगे चल रहे आइजनकोट ने शर्त रखी है कि हमास को आतंकी संगठन मानने वाली पार्टियां ही सरकार का हिस्सा बनेंगी। वहीं दूसरी ओर, उनकी संभावित सहयोगी पार्टी ‘राम’ (Ra’am) के प्रमुख मंसूर अब्बास ने इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग (Isaac Herzog) से मुलाकात कर आइजनकोट को समर्थन देने की सिफारिश तो की है, लेकिन हमास को सार्वजनिक रूप से ‘आतंकी संगठन’ कहने से इनकार कर दिया है।

अब्बास का तर्क है कि वह फिलिस्तीनियों और इजरायल के बीच शांति का पुल बने रहना चाहते हैं और हमास को आतंकी कहने से उनके व उनके परिवार की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है। अब्बास दो-राष्ट्र समाधान और सभी सशस्त्र समूहों के निरस्त्रीकरण का समर्थन करते हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आइजनकोट अपने सख्त रुख और गठबंधन की मजबूरियों के बीच सरकार का गठन किस प्रकार करते हैं।

 

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