पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में हाल ही में हुए दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर देश को झकझोर कर रख दिया है। इस वीभत्स दुर्घटना में पंडाल का हिस्सा ढहने और मची भगदड़ के कारण 19 मासूम लोगों की जान चली गई, जबकि दो दर्जन से अधिक श्रद्धालु गंभीर रूप से घायल हैं। हालांकि, धार्मिक आयोजनों, पूजा समारोहों और पर्व-त्योहारों के दौरान भगदड़ या अन्य कारणों से इस तरह की त्रासदियों का यह कोई पहला मामला नहीं है। बीते वर्षों में देश के विभिन्न मंदिरों, धार्मिक मेलों और स्नान पर्वों के दौरान कई ऐसे बड़े हादसे हो चुके हैं, जिनमें सैकड़ों बेकसूर लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। आइए नजर डालते हैं देश के इतिहास में दर्ज ऐसे ही कुछ बड़े और दर्दनाक हादसों पर।
हाल के वर्षों में हुए प्रमुख धार्मिक हादसे और भगदड़ की घटनाएं
पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों में आयोजित बड़े आयोजनों में भीड़ के बेकाबू होने या कुप्रबंधन के चलते कई गंभीर दुर्घटनाएं सामने आई हैं:
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17 अगस्त 2026 (बिहार): सावन के पवित्र महीने के दौरान बिहार के प्रसिद्ध अशोक धाम मंदिर में उमड़ी भारी भीड़ के बीच मची भगदड़ में 7 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी।
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1 नवंबर 2025 (आंध्र प्रदेश): कासीबुग्गा स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में दर्शन के दौरान अचानक हालात बिगड़े और भगदड़ मचने से नौ लोगों की जान चली गई थी।
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15 फरवरी 2025 (नई दिल्ली): महाकुंभ में शामिल होने जा रहे यात्रियों की अत्यधिक भीड़ के चलते नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मच गई थी, जिसमें 18 लोगों की मौत हुई थी। इससे ठीक पहले 29 जनवरी 2025 को प्रयागराज महाकुंभ में मौनी अमावस्या के पावन स्नान के अवसर पर हुई भगदड़ में 30 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और 60 घायल हुए थे।
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3 मई 2025 (गोवा): शिरगांव स्थित श्री लैराई देवी मंदिर में आयोजित जात्रा (उत्सव) के दौरान मची भगदड़ में 7 लोगों की मौत हो गई थी और करीब 80 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
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8 जनवरी 2025 (आंध्र प्रदेश): तिरुमला में वैकुंठ द्वार दर्शन के लिए टिकट काउंटरों पर लगी भारी भीड़ के बीच हुई भगदड़ में 6 लोगों की मौत हो गई थी।
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12 अगस्त 2024 (बिहार): सावन मास के दौरान बिहार के बाबा सिद्धनाथ मंदिर में मची भगदड़ में 7 श्रद्धालुओं की मौत हुई थी और 10 लोग घायल हुए थे।
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2 जुलाई 2024 (उत्तर प्रदेश): हाथरस जिले में एक सत्संग के समापन के बाद अचानक पैदा हुए हालातों और भारी भीड़ के दबाव के कारण हुई भीषण भगदड़ में 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।
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31 मार्च 2023 (मध्य प्रदेश): इंदौर के एक मंदिर में रामनवमी के पावन अवसर पर हवन चल रहा था, तभी अधिक भार के कारण प्राचीन बावड़ी की छत अचानक धंस गई। इस हृदयविदारक हादसे में 36 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
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23 अक्टूबर 2023 (बिहार): गोपालगंज जिले में राजा दल दुर्गा पूजा पंडाल के दौरान महा नवमी के मौके पर उमड़ी भारी भीड़ के बीच भगदड़ मचने से एक बच्चे समेत तीन लोगों की मौत हो गई थी और 17 लोग घायल हुए थे।
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1 जनवरी 2022 (जम्मू-कश्मीर): नए साल के पहले दिन माता वैष्णो देवी मंदिर भवन में भारी भीड़ के दबाव के चलते मची भगदड़ में 12 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी और 12 से अधिक घायल हुए थे।
दशकभर पुराने वे बड़े हादसे, जिन्होंने देश को रुला दिया
इससे पहले के वर्षों में भी देश ने कई ऐसे भीषण धार्मिक हादसे देखे हैं, जिनकी यादें आज भी लोगों के दिलों में सिहरन पैदा कर देती हैं:
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14 जुलाई 2015 (आंध्र प्रदेश): राजमहेंद्रवरम में गोदावरी नदी के तट पर पुष्करम स्नान के दौरान मची भगदड़ में 27 लोगों की जान चली गई थी।
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13 अक्टूबर 2013 (मध्य प्रदेश): नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान दतिया जिले के प्रसिद्ध रतनगढ़ माता मंदिर में भारी भीड़ के बीच भगदड़ मच गई थी, जिसमें 115 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। वहीं, 3 अक्टूबर 2014 को बिहार के पटना में गांधी मैदान में रावण दहन (दशहरा समारोह) के बाद मची भगदड़ में 32 लोगों की मौत हो गई थी।
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19 नवंबर 2012 (बिहार): पटना में छठ पूजा के दौरान अर्घ्य देने के लिए बना अस्थायी पुल अचानक टूटने से भगदड़ जैसे हालात बन गए थे, जिसमें लगभग 20 लोगों की मौत हो गई थी।
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8 नवंबर 2011 (उत्तराखंड): हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी पर गंगा स्नान के दौरान मची भगदड़ में 20 लोगों की जान चली गई थी।
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14 जनवरी 2011 (केरल): सबरीमाला से दर्शन कर लौट रहे श्रद्धालुओं के बीच पुलमेडु नामक स्थान पर हुए भीषण हादसे में 104 लोगों की मौत हो गई थी।
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4 मार्च 2010 (उत्तर प्रदेश): प्रतापगढ़ के कुंडा स्थित राम जानकी मंदिर में एक आयोजन के दौरान मुफ्त कपड़े और भोजन बांटने के समय मची भगदड़ में करीब 63 लोगों की जान चली गई थी।
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30 सितंबर 2008 (राजस्थान): जोधपुर के चामुंडा देवी मंदिर में परिसर के भीतर बम होने की महज एक अफवाह फैल गई, जिसके बाद मची भगदड़ में लगभग 250 लोगों की मौत हो गई थी। इससे कुछ महीने पहले 3 अगस्त 2008 को हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में चट्टानें खिसकने की अफवाह के कारण हुई भगदड़ में 162 लोगों की जान चली गई थी।
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25 जनवरी 2005 (महाराष्ट्र): सातारा जिले के मांढरदेवी मंदिर में आयोजित वार्षिक धार्मिक यात्रा के दौरान हुई भीषण भगदड़ में 340 से अधिक लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी, जो देश के सबसे बड़े हादसों में गिना जाता है।
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27 अगस्त 2003 (महाराष्ट्र): नासिक में कुंभ मेले के दौरान शाही स्नान के वक्त साधु-संतों और श्रद्धालुओं के बीच मची भगदड़ में 39 लोगों की मौत हो गई थी।
सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की सख्त जरूरत
इन तमाम त्रासदियों के कारणों पर गौर करें तो सामने आता है कि कभी अनियंत्रित भीड़, कभी किसी अफवाह, तो कभी अस्थाई ढांचों के ढहने या कुप्रबंधन के कारण हालात बेकाबू हुए हैं। ये तमाम घटनाएं इस बात की गंभीर चेतावनी देती हैं कि देश के बड़े धार्मिक आयोजनों और मेलों में भीड़ को नियंत्रित करने, प्रवेश और निकास के लिए चौड़े रास्ते खुले रखने, सुरक्षा मानकों का पालन करने और आपात स्थिति से निपटने के पुख्ता इंतजाम कितने ज्यादा जरूरी हैं, ताकि भविष्य में किसी भी परिवार को इस तरह का गम न झेलना पड़े।


















