दुबई / न्यूयॉर्क। मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव और युद्ध के बीच ईरान ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा माने जाने वाले ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने और परमाणु वार्ता की बहाली के लिए अमेरिका के सामने एक अहम प्रस्ताव रखा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सत्र के दौरान ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) ने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका उनकी तीन प्रमुख मांगों को स्वीकार करता है, तो महज 7 दिनों के भीतर इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही फिर से बहाल कर दी जाएगी। ईरान के इस नए कूटनीतिक रुख के बाद अब पूरी गेंद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पाले में है।
ईरान की 3 मुख्य शर्तें क्या हैं?
ईरान ने मध्यस्थ देश कतर के जरिए अपना 7-दिवसीय फॉर्मूला अमेरिका तक पहुंचाया है। इस प्रस्ताव के तहत अमेरिका को निम्नलिखित तीन कदम उठाने होंगे:
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नौसैनिक नाकाबंदी का खात्मा: ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसेना की सैन्य नाकाबंदी को तुरंत हटाया जाए।
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तेल प्रतिबंधों में ढील: ईरान की वैश्विक तेल बिक्री पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों (Sanctions) को वापस लिया जाए।
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व्यापक युद्धविराम: इजरायल और हमास/हिजबुल्लाह संघर्ष के बीच लेबनान को शामिल करते हुए एक पूर्ण युद्धविराम (Ceasefire) लागू किया जाए।
7 दिनों का समयबद्ध खाका (Roadmap)
विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार, जैसे ही अमेरिका इस प्रस्ताव को मंजूरी देगा, समयसीमा की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी:
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दिन 1 से 5: अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने और तेल प्रतिबंधों में ढील देने की शुरुआती प्रक्रिया पूरी करेगा।
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छठा दिन (Day 6): शर्तों के आंशिक अनुपालन के बाद ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए आधिकारिक तौर पर खोल दिया जाएगा।
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सातवां दिन (Day 7): दोनों देश परमाणु कार्यक्रम और अन्य क्षेत्रीय मुद्दों पर अंतिम स्थायी समझौते के लिए औपचारिक वार्ता टेबल पर लौटेंगे।
चीन का समर्थन और जून समझौते की कड़वी यादें
ईरान के इस प्रस्ताव को वैश्विक मंच पर चीन का कड़ा समर्थन मिला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई उच्चस्तरीय वार्ता के दौरान शी ने ट्रंप से इस संकट का हल निकालने और जून में तय हुए समझौते (MOU) की ओर लौटने की अपील की। चीन के लिए यह समुद्री मार्ग इसलिए बेहद अहम है क्योंकि उसकी कुल ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियान ने भी बीजिंग के इस सकारात्मक रुख की सराहना की है।
गौरतलब है कि इससे पहले जून 2026 में भी दोनों देशों के बीच 60 दिनों की अंतरिम शांति को लेकर एक सहमति बनी थी, लेकिन आपसी अविश्वास और समुद्र में हमलों के कारण वह समझौता धरा का धरा रह गया था।
सऊदी अरब और खाड़ी देशों का संदेह
जहाँ एक ओर ईरान इस कूटनीतिक पहल को भुनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश इस पर पूरी तरह भरोसा करने से कतरा रहे हैं। यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर और सऊदी तेल पाइपलाइनों पर हाल ही में बढ़ाए गए हमलों के कारण सऊदी अरब बेहद सतर्क है। उसे डर है कि ईरान महज समय बिताने और प्रतिबंधों में ढील हासिल करने के लिए यह चाल चल रहा है।
क्यों अहम है ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’?
युद्ध और गतिरोध से पहले दुनिया के कुल कच्चे तेल (Crude Oil) और एलएनजी (LNG) व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता था। इस मार्ग के बंद होने से वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जिससे दुनिया भर में महंगाई का खतरा बढ़ गया है।
अब पूरी दुनिया की नजरें वाशिंगटन के रुख पर टिकी हैं कि क्या अमेरिका अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों और महंगाई से राहत पाने के लिए ईरान की इस शर्त को स्वीकार करता है या फिर यह संकट और गहराएगा।
















