सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: आपसी रजामंदी से टूटे रिश्तों को ‘रेप’ नहीं माना जा सकता 

सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में स्पष्ट किया है कि कानून बनाने वालों का कभी यह इरादा नहीं था कि आपसी रजामंदी से बालिगों के बीच बने शारीरिक संबंधों को, रिश्ता टूटने के बाद, पुराने समय से लागू करके अपराध मान लिया जाए. शीर्ष अदालत ने शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने के एक मामले में आरोपी शख्स को रेप के आरोपों से बरी करते हुए यह टिप्पणी की है. कोर्ट का यह फैसला उन मामलों में एक बड़ी कानूनी राहत लेकर आया है, जहां आपसी सहमति से खत्म हो चुके रिश्तों को बाद में आपराधिक मुकदमों में बदल दिया जाता है.

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच की अहम टिप्पणियां

अदालत ने सुनवाई के दौरान हाल के दिनों में बढ़ते एक ‘चिंताजनक चलन’ पर गहरी चिंता जताई. बेंच ने कहा कि आज के दौर में खत्म हो चुके आपसी सहमति वाले रिश्तों की इस तरह से पड़ताल की जाती है ताकि यह साबित किया जा सके कि पिछली घटनाएं यौन उत्पीड़न थीं. अदालत ने दो स्पष्ट स्थितियों के बीच अंतर समझाया:

  1. शुरुआत से धोखा: जहां सहमति का आधार ही शुरुआत से झूठ और धोखाधड़ी के जाल पर टिका हो.

  2. रिश्ता टूटने के बाद पछतावा: जहां रिश्ता खत्म होने के बाद किसी व्यक्ति को अपने पिछले संबंधों पर पछतावा हो.

कोर्ट ने साफ किया कि दूसरी स्थिति भले ही दुर्भाग्यपूर्ण हो, लेकिन इसे आपसी सहमति वाले रिश्ते को अपराध मानने का आधार नहीं बनाया जा सकता और न ही इसके दम पर आपराधिक न्याय प्रणाली का दुरुपयोग किया जाना चाहिए.

“पुरुष की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मर्जी पर भी असर”

सर्वोच्च अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि बिगड़े हुए रिश्तों को रेप के मामलों में बदलने का यह नजरिया पुरुष की व्यक्तिगत आजादी पर भी रोक लगाता है. कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या इस डर से कि कहीं बाद में रेप का आरोप न लग जाए, कोई पुरुष हमेशा के लिए किसी रिश्ते में बंधने को मजबूर रहेगा?

अदालत ने कहा:

  • क्या किसी को रिश्ते से बाहर निकलने का अधिकार नहीं है?

  • क्या रिश्ते के टूटने के फैसले को धोखा या धोखाधड़ी मान लिया जाए? बिल्कुल नहीं.

  • सिर्फ इसलिए कि रिश्ता खराब हो चुका है और अब खत्म हो गया है, अतीत में बने आपसी सहमति के संबंधों को रेप करार देना सरासर गलत है.

रेप जैसे गंभीर अपराध की गरिमा और न्याय प्रणाली का दुरुपयोग रोकने पर जोर

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि रेप किसी महिला की शारीरिक स्वायत्तता और उसकी गरिमा पर एक बहुत गहरा प्रहार है. अदालत ने माना कि कई वास्तविक पीड़ित आज भी सामाजिक और पारिवारिक प्रतिष्ठा के डर से सामने नहीं आ पाते हैं, इसलिए जहां सचमुच यौन हिंसा या जोर-जबरदस्ती हुई है, वहां पूरी सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए.

साथ ही, कोर्ट ने चेतावनी दी कि न्याय प्रणाली का गलत इस्तेमाल रोक जाना बेहद जरूरी है. आपसी रजामंदी से बने रिश्तों के बिगड़ने पर उन्हें आपराधिक मामलों में तब्दील करने से न केवल असली मामलों की गंभीरता कम होती है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया का भी दुरुपयोग होता है.

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