पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के त्रिकोणीय रक्षा समझौते की शर्तें उजागर, जानें 10 साल के इस महागठबंधन का पूरा गणित

नई दिल्ली। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक त्रिकोणीय रक्षा समझौते को लेकर वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। हालिया जानकारी के अनुसार, इस रक्षा गठबंधन की शर्तें और खाका अब पूरी तरह से सामने आ चुके हैं। इस बहुचर्चित समझौते के तहत तीनों ही सदस्य देशों को कम से कम 10 वर्षों तक अनिवार्य रूप से इस गठबंधन में साथ रहना होगा। यदि 10 साल की इस निर्धारित समयावधि के बाद भी कोई देश इस रक्षा समझौते से अलग होना चाहता है, तो उसे निष्क्रमण प्रक्रिया के तहत कम से कम तीन महीने पहले लिखित में आधिकारिक नोटिस देना होगा। इस ऐतिहासिक समझौते का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों की आपसी सुरक्षा चिंताओं को दूर करना और सैन्य सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है।

मक्का में हुआ था करार, जानें कब से लागू होंगी 10 साल की शर्तें

गौरतलब है कि पवित्र शहर मक्का में 7 अगस्त 2026 को आयोजित एक विशेष समारोह के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस रणनीतिक समझौते पर अपने हस्ताक्षर किए थे। इस पूरे समझौते को कुल 16 अनुच्छेदों (Articles) में विभाजित किया गया है। समझौते के अनुच्छेद 16 के प्रावधानों के अनुसार, 10 साल की अनिवार्य अवधि की गणना हस्ताक्षर की तारीख से नहीं की जाएगी। बल्कि, यह समयसीमा तब से शुरू होगी जब तीनों देशों के अनुसमर्थन (Ratification) से जुड़ा अंतिम कानूनी दस्तावेज आधिकारिक रूप से गठबंधन के केंद्रीय सचिवालय में जमा हो जाएगा। इसके बाद ही किसी देश द्वारा गठबंधन छोड़ने की निर्धारित समय-सीमा की उल्टी गिनती शुरू होगी।

यदि एक सदस्य देश पर हुआ हमला, तो बाकी दो सहयोगियों का क्या होगा रुख?

समझौते के सबसे महत्वपूर्ण यानी अनुच्छेद 2 के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी भी सदस्य देश पर किसी बाहरी देश या देशों के समूह द्वारा सशस्त्र या सैन्य हमला किया जाता है, तो बाकी दोनों मित्र राष्ट्रों को पीड़ित देश की सुरक्षा और सहायता के लिए आगे आना होगा। हालांकि, यह धारा स्वतः रूप से युद्ध की घोषणा या एक समान सैन्य कार्रवाई की बाध्यता नहीं लाती है। समझौते में यह साफ किया गया है कि संकट के समय प्रदान की जाने वाली मदद का स्वरूप, स्तर और दायरा पीड़ित देश की वास्तविक आवश्यकताओं और सहयोगियों की तत्कालीन सैन्य क्षमता व संसाधनों पर निर्भर करेगा।

तुर्की की संसद में पहुंचा प्रस्ताव, खुफिया जानकारी साझा करने पर बनी सहमति

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की सरकार ने इस समझौते को कानूनी अमलीजामा पहनाने और अपनी संसद (Parliament) से औपचारिक मंजूरी दिलाने के लिए पेश कर दिया है। इस रक्षा समझौते के दायरे में सिर्फ पारस्परिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि तीनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित करना, संवेदनशील खुफिया जानकारियों का रियल-टाइम आदान-प्रदान करना और रक्षा उत्पादन व तकनीक के क्षेत्र में साझा सहयोग बढ़ाना भी शामिल है।

हूती हमलों के साये में सऊदी की नई रणनीति और क्षेत्रीय संतुलन

हालिया समय में सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों द्वारा किए जा रहे लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों की पृष्ठभूमि में इस रक्षा समझौते की महत्ता काफी बढ़ गई है। हालांकि तुर्की ने इस त्रिस्तरीय गठबंधन को एक पूरी तरह से ‘रक्षात्मक साझेदारी’ का नाम दिया है, लेकिन युद्ध या किसी आपातकालीन संकट के दौरान तीनों देश जमीनी स्तर पर किस हद तक अपनी सेनाएं या संसाधन भेजेंगे, इसका अंतिम फैसला उनके उपलब्ध संसाधनों और तत्कालीन प्राथमिकताओं के आधार पर ही तय होगा।

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