योम किप्पुर का सबक: भारत और इज़राइल को मिलकर प्रतिरोधक क्षमता क्यों विकसित करनी चाहिए

कर्नल रोहित देव

6 अक्टूबर 1973 को दोपहर 2 बजे, स्वेज नहर पर मिस्र की तोपें गरज उठीं और सीरियाई बख्तरबंद दस्ते गोलान हाइट्स की ओर बढ़ने लगे। खुफिया तंत्र, भौगोलिक बढ़त और पिछली सैन्य जीतों पर इज़राइल का भरोसा एक सुनियोजित आकस्मिक हमले से टकराया, जिसने धारणाओं की सीमाएँ उजागर कर दीं। योम किप्पुर युद्ध ने स्थायी सबक छोड़ा—प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) तभी विश्वसनीय होती है, जब कोई देश अचानक हुए हमले को झेल सके, दुश्मन को उसका उद्देश्य हासिल करने से रोक सके और सटीक जवाबी प्रहार कर सके। भारत के लिए यह सबक इज़राइल के साथ अधिक गहरी और सुव्यवस्थित रणनीतिक साझेदारी का आधार बनना चाहिए।
शुरुआती हमले ने दो गंभीर कमजोरियाँ उजागर कीं।

 

सोवियत संघ से मिली Sagger मिसाइलों ने दूर से इज़राइली बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाया, जबकि सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के बहुस्तरीय नेटवर्क ने इज़राइली वायुसेना को सीमित कर दिया। Valley of Tears में लेफ्टिनेंट कर्नल अविगडोर कहलानी और 77वीं Armoured Battalion ने रिज़र्व बलों के जुटने तक अपने से कहीं बड़ी सीरियाई सेना को रोके रखा। अंततः वहाँ 250 से अधिक सीरियाई बख्तरबंद वाहनों का मलबा था। इज़राइल डिफेंस फोर्सेज़ ने जवाबी हमला कर स्वेज नहर पार की, मिस्र की Third Army को घेरा और गोलान में क्षेत्र वापस हासिल किया। इज़राइल विजयी रहा, लेकिन 2,600 से अधिक जानें गईं। कहलानी के साहस का सबक था—वीरता के साथ अनुकूलन जरूरी है, वरना वही कीमत फिर चुकानी पड़ती है।

इज़राइल ने इस अनुभव को बेहतर खुफिया क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, सटीक प्रहार, मानवरहित प्रणालियों और सक्रिय सुरक्षा तकनीक के एकीकृत तंत्र में बदला। युद्ध की विफलताएँ तकनीकी समाधान की तात्कालिकता बनीं और समस्या से deployable solution तक पहुँचने का समय लगातार घटा। Harop loitering munition और Trophy active protection system इसी निवेश के परिणाम हैं। बाद में ये भारत तक भी पहुँचे—एक ऐसा साझेदार, जिसने अपने संघर्षों से समान सबक सीखे थे।

भारत के लिए इसका सबसे निकट उदाहरण 1999 का कारगिल युद्ध है। पाकिस्तान समर्थित बलों ने सामरिक ऊँचाइयों पर कब्ज़ा कर निगरानी की कमियों का फायदा उठाया और भारत को कठिन चढ़ाई वाले हमले करने पड़े। भारत ने युद्ध के बीच रणनीति बदली—तोपखाने की शक्ति केंद्रित की, वायु-थल समन्वय सुधारा और पहल वापस हासिल की। दोनों युद्धों की चेतावनी समान है: जब युद्ध से पहले deterrence विफल होता है, तो सैनिकों को कहीं अधिक कीमत चुकाकर उसे युद्धभूमि पर फिर स्थापित करना पड़ता है।
यही वास्तविकता ऑपरेशन सिंदूर में भारत की संतुलित precision response के तर्क को भी रेखांकित करती है, जिसमें नियंत्रण रेखा के पार आतंकी ढाँचों के विरुद्ध इज़राइल निर्मित Harop loitering munitions और Spice-250 precision glide bomb kits का इस्तेमाल किया गया। आधुनिक जवाबी कार्रवाई के लिए लगातार निगरानी, सटीक targeting, stand-off reach और escalation पर राजनीतिक नियंत्रण जरूरी हैं। इन क्षमताओं को अलग-अलग imports नहीं, बल्कि एक integrated network की तरह काम करना होगा।

उन्नत प्रणालियों का आयात भारत की स्थायी रणनीति नहीं हो सकता। संकट में supply chains बाधित हो सकती हैं, software पुराना पड़ सकता है और विदेशों के लिए बने उपकरण लद्दाख की ऊँचाई या राजस्थान की गर्मी में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकते। Co-development भारत को design पर संप्रभु नियंत्रण, स्थानीय sustainment capacity और exportable intellectual property देता है।

भारत और इज़राइल का रणनीतिक तालमेल स्पष्ट है। दोनों लोकतंत्र आतंकवाद, drones, contested borders, cyber pressure और खुले युद्ध की सीमा से नीचे ambiguity का लाभ उठाने वाले विरोधियों का सामना करते हैं। दोनों strategic autonomy और technology को महत्व देते हैं। इज़राइल के पास integrated innovation ecosystem और संघर्षों से मिला operational feedback है; भारत के पास strategic depth, engineering talent, manufacturing scale और बड़ा defence market है।
संस्थागत ढाँचा पहले से मौजूद है। India-Israel Industrial R&D and Technological Innovation Fund संयुक्त development और commercialisation को समर्थन देता है। फरवरी 2026 के Jerusalem Summit ने संबंधों को Special Strategic Partnership for Peace, Innovation and Prosperity के स्तर तक पहुँचाया और Fund को co-development mechanism के रूप में औपचारिक भूमिका दी। अब इसे चार दिशाओं में आगे बढ़ाना होगा।

पहला, दोनों सेनाएँ वायु, थल, समुद्र, साइबर और अंतरिक्ष में जटिल संयुक्त अभ्यास संस्थागत बनाएं, ताकि shared doctrine विकसित हो और सबक सीधे system designers तक पहुँचें। दूसरा, co-development में active protection, autonomous systems, counter-drone networks और advanced radar को प्राथमिकता मिले और इन्हें भारत की ऊँचाई, रेगिस्तानी गर्मी तथा Line of Control के अनुरूप ढाला जाए। तीसरा, industrial cooperation licensed assembly से आगे बढ़े; intellectual property ownership, source-code access और export permissions शुरुआत में तय हों, तथा भारतीय कंपनियाँ और प्रयोगशालाएँ इज़राइली साझेदारों के साथ common programme architecture में काम करें। चौथा, ammunition, sensors, drone components और air-defence interceptors के लिए assured supply chains और joint production capacity विकसित हो, जो दोनों सेनाओं तथा approved export markets की जरूरतें पूरी करे।

योम किप्पुर का स्थायी सबक यह नहीं कि हर surprise attack रोका जा सकता है; बल्कि यह कि surprise कभी paralysis में न बदले। 1973 में battlefield resilience ने इज़राइल को बचाया, लेकिन बड़ी उपलब्धि तब हुई जब कठिन सबक doctrine, technology और industrial capacity में बदले। भारत और इज़राइल को इस adaptation cycle को साझा प्रयास बनाना चाहिए—साथ अभ्यास करके, critical systems का सह-विकास करके और wartime supply chains सुरक्षित बनाकर। सफलता का पैमाना वह strategic trust और integrated industrial capacity होगी, जो सुनिश्चित करे कि दुश्मन का पहला प्रहार अपने उद्देश्य में विफल रहे। योम किप्पुर की वर्षगांठ पर इस प्रतिबद्धता को व्यवहार में उतारना ही वास्तविक दायित्व है।

लेखक : कर्नल रोहित देव दूसरी पीढ़ी के Military Veteran और Strategic Thinker हैं। उन्हें Geopolitics, Internal Security, Defence और Renewable Energy Sector में विशेषज्ञता प्राप्त है। वे एक प्रमुख media personality और लेखक भी हैं।
लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।

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