
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने लगी है। भारतीय जनता पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की जुगत में लगी है, तो वहीं समाजवादी पार्टी अपनी मजबूत वापसी के लिए रणनीति तैयार कर रही है। हालांकि, राज्य की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी की चर्चा चुनावी तैयारियों के बजाय एक अलग ही विषय पर हो रही है। बसपा में इन दिनों चुनावी रणनीति से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि मायावती की राजनीतिक विरासत किसके हाथों में जाएगी। राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह संघर्ष पार्टी में किसी उत्तराधिकार की जंग का नहीं, बल्कि गद्दी अपने ही परिवार के किस सदस्य को सौंपी जाए, उस दुविधा का है।
बसपा सुप्रीमो मायावती अपने सार्वजनिक भाषणों और बयानों में अक्सर बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर और पार्टी के संस्थापक कांशीराम की विचारधारा का हवाला देती हैं। वे दोहराती हैं कि बहुजन समाज ही उनका असली परिवार है और पार्टी किसी व्यक्ति या परिवार की निजी संपत्ति नहीं है। लेकिन जब बात अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के चुनाव की आती है, तो उनकी तलाश घूम-फिरकर उनके छोटे भाई आनंद कुमार के घर पर ही जाकर खत्म होती है। वे इस फैसले को अपने बाद के समय पर छोड़ने के बजाय अभी तय कर लेना चाहती हैं, मगर उनके लगातार बदलते फैसलों ने समर्थकों को हैरान कर दिया है।

फैसलों की भूलभुलैया: आकाश, ईशान और दीपिका के बीच झूलती विरासत
पार्टी के भीतर उत्तराधिकारी का नाम तय करने का सिलसिला किसी हाई-ड्रामा से कम नहीं रहा है। मायावती ने सबसे पहले अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे बढ़ाया, उन्हें युवा चेहरे के तौर पर पेश किया और बड़ी जिम्मेदारियां दीं। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें पद से हटा दिया गया। इसके बाद आकाश की दोबारा वापसी हुई, लेकिन फिर से उन्हें जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया। मायावती ने सार्वजनिक तौर पर आकाश के राजनीतिक व्यवहार और उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ के प्रभाव पर सवाल उठाए।
इसके बाद छोटे भतीजे ईशान आनंद का नाम सामने आया। अभी ईशान के नाम की चर्चा चल ही रही थी कि मायावती ने ऐलान कर दिया कि दोनों भतीजों को राजनीति से दूर रखा जाएगा। उन्होंने संकेत दिए कि अगर भाई की बेटी दीपिका आनंद चाहें, तो उन्हें पार्टी में आगे लाया जा सकता है। हालांकि, 20 सितंबर को आए उनके ताजा बयान ने एक बार फिर पूरी तस्वीर बदल दी। मायावती ने स्पष्ट किया कि आकाश और दीपिका को जिम्मेदारियों से बाहर रखा जाएगा और ईशान आनंद को संगठन में सम्मानजनक भूमिका देकर आगे बढ़ाया जाएगा। महज आठ दिनों के भीतर बदले इन फैसलों ने पार्टी के कैडर को असमंजस में डाल दिया है, जबकि विपक्षी दलों को तंज कसने का मौका दे दिया है।
एक समय था दबदबा, अब गिरता वोट बैंक और सिमटती सीटें
बसपा का गठन जिस सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा के आधार पर हुआ था, उसमें व्यक्ति से अधिक मिशन और परिवार से अधिक बहुजन समाज के हितों को प्राथमिकता दी गई थी। कांशीराम ने जिस संगठन की नींव रखी, मायावती उसकी सबसे सफल उत्तराधिकारी बनीं। उन्होंने पार्टी को उत्तर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया। साल 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने अपने दम पर 30.43 प्रतिशत वोट हासिल कर 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।
हालांकि, 2007 के बाद से बसपा का ग्राफ लगातार ढलान पर है। 2012 के चुनाव में पार्टी 80 सीटों पर सिमट गई, जबकि 2017 में उसे महज 19 सीटें मिलीं। 2022 का झटका सबसे बड़ा था, जब 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा सिर्फ एक सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया। लोकसभा चुनावों में भी यही स्थिति दिखी—2014 में शून्य, 2019 में सपा के साथ गठबंधन के बल पर 10 सीटें और 2024 के आम चुनाव में अकेले लड़ने पर बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई। उसका वोट प्रतिशत घटकर 9.39 रह गया। आंकड़े साफ बताते हैं कि पार्टी पर मायावती की पकड़ भले ही मजबूत हो, लेकिन उनका जनाधार तेजी से खिसक रहा है।
संगठनात्मक कमियां और जमीन पर संघर्ष का अभाव
चुनावी असफलताओं के बीच राजनीतिक दल नए समीकरण तलाशते हैं, लेकिन बसपा में बड़े नेताओं के आने-जाने का सिलसिला बहुत तेज रहा है। जैसे ही कोई चेहरा मीडिया या समर्थकों के बीच लोकप्रिय होने लगता है, उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। इसके अलावा, राज्य की राजनीति में बड़े आंदोलनों या धरातल पर संघर्ष की कमी भी साफ झलकती है। चुनावी रैलियों के अलावा मायावती की सार्वजनिक उपस्थिति सीमित रहती है। जमीनी मुद्दों पर पार्टी कैडर को सक्रिय करने के बजाय पूरी ऊर्जा पारिवारिक फैसलों और सांगठनिक फेरबदल में खर्च होती दिख रही है।
परिवारवाद का द्वंद और बसपा की साख का सवाल
क्षेत्रीय राजनीति में किसी एक परिवार का वर्चस्व कोई नई बात नहीं है। आंध्र प्रदेश में तेदेपा, तमिलनाडु में द्रमुक, बिहार में राजद या उत्तर प्रदेश में सपा—हर जगह सत्ता के हस्तांतरण को लेकर संघर्ष देखा गया है। लेकिन बसपा का दावा हमेशा से पारंपरिक राजनीतिक घरानों से अलग रहा है। कांशीराम का जीवन इसी सिद्धांत का प्रतीक था। मायावती आज भी कहती हैं कि बसपा किसी परिवार की जागीर नहीं है, लेकिन विडंबना यह है कि उत्तराधिकार की हर नई योजना उनके भाई के बच्चों के इर्द-गिर्द ही घूमती है।
अब 23 सितंबर की प्रस्तावित बैठक पर सभी की नजरें टिकी हैं, जहां ईशान आनंद की औपचारिक भूमिका को लेकर बड़ा ऐलान हो सकता है। देखना यह होगा कि उत्तराधिकारी की यह पारिवारिक तलाश बसपा को फिर से मजबूत बना पाती है या 2027 के चुनाव से पहले उसके घटते आधार को और नुकसान पहुंचाती है।












