यूपी विधान परिषद चुनाव: भाजपा ने शिक्षक-स्नातक सीटों पर चला बड़ा दांव, 11 में से 5 सीटों पर ब्राह्मण चेहरे उतार साघा जातीय समीकरण

लखनऊ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उत्तर प्रदेश में आगामी विधान परिषद (एमएलसी) की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 11 सीटों के लिए अपने प्रत्याशियों का ऐलान करते हुए सोशल इंजीनियरिंग का बड़ा दांव चला है। पार्टी ने घोषित 11 में से 5 सीटों पर ब्राह्मण चेहरों पर दांव लगाया है। भाजपा के इस रणनीतिक कदम को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यूजीसी के नए नियमों को लेकर सवर्ण वर्ग में उपजी नाराजगी और राजनीतिक बेचैनी को शांत करने की एक बड़ी सियासी कवायद के रूप में देखा जा रहा है।

यूजीसी विवाद और सवर्ण असंतोष: शिक्षक-स्नातक वर्ग को साधने की अनूठी कोशिश शिक्षक और स्नातक एमएलसी सीटों का सीधा संबंध विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों, प्राध्यापकों और पढ़े-लिखे युवाओं से होता है। पिछले कुछ समय से यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए दिशा-निर्देशों को लेकर सवर्ण समुदाय, खासकर ब्राह्मण और ठाकुर समाज के युवाओं व बुद्धिजीवियों के बीच तीखा असंतोष देखने को मिल रहा था। भाजपा के भीतर से भी प्रदेश संगठन के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इस जनाक्रोश को लेकर चिंता जताई थी। पार्टी ने इन क्षेत्रों में 5 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारकर सीधे तौर पर संवाद कायम करने और असंतोष पर मरहम लगाने का संदेश दिया है।

संतुलित ‘सामाजिक पैकेज’: तीन ओबीसी, दो राजपूत और एक वैश्य को भी मिला मौका ब्राह्मण वर्ग को तरजीह देने के साथ ही भाजपा ने अपनी सर्वसमावेशी छवि को बनाए रखने के लिए पूरा सामाजिक संतुलन साधा है। पार्टी ने अपने इस विशेष ‘सोशल पैकेज’ में तीन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), दो राजपूत (ठाकुर) और एक वैश्य प्रत्याशी को टिकट देकर साफ कर दिया है कि वह किसी एक वर्ग पर निर्भर रहने के बजाय हर समुदाय को साथ लेकर चलने की रणनीति पर कायम है। इस तरह से भाजपा ने अगड़ों और पिछड़ों का एक अभेद्य राजनीतिक किला तैयार करने की कोशिश की है।

विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मजबूत सियासी संदेश देने की होड़ उत्तर प्रदेश में साल 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले विधान परिषद की इन सीटों पर हो रहा मुकाबला बेहद निर्णायक माना जा रहा है। भाजपा का मकसद एमएलसी चुनाव के जरिए यह स्पष्ट संदेश देना है कि वह अपने कोर वोटर बेस के साथ-साथ समाज के हर तबके के साथ मजबूती से खड़ी है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि टिकटों के जरिए जो सामाजिक संतुलन का संदेश दिया गया है, उसे स्थानीय और संगठन स्तर पर प्रभावी संवाद में कैसे बदला जाए।

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