
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को होने वाली वोटिंग ने राज्य का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हो रहे इस चुनाव को भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच मनोवैज्ञानिक शक्ति परीक्षण माना जा रहा है। नौ सीटों का गणित लगभग तय है, लेकिन असली घमासान 10वीं सीट को लेकर है, जहां जीत दर्ज करने के लिए ना तो भाजपा और ना ही सपा के पास अपने दम पर पर्याप्त आंकड़े मौजूद हैं।
विधानसभा का गणित और जीत के लिए चाहिए 37 वोटों का आंकड़ा
उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यों वाली विधानसभा में बीते 11 महीनों में सात विधायकों के निधन के कारण मौजूदा सदस्य संख्या घटकर 396 रह गई है। इस समीकरण के तहत अब राज्यसभा की एक सीट पर जीत हासिल करने के लिए पहली पसंद के 37 प्राथमिक वोटों की आवश्यकता होगी।
समाजवादी पार्टी की बिसात और तीसरे प्रत्याशी का सस्पेंस
समाजवादी पार्टी के पास वर्तमान में अपने 101 विधायक हैं। कांग्रेस के दो विधायकों के समर्थन के साथ सपा गठबंधन का आंकड़ा 103 तक पहुंचता है। सपा ने पांच बार के सांसद रामगोपाल यादव और रिलायंस इंडस्ट्रीज के एग्जीक्यूटिव धनराज नाथवानी को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए सपा को $2 \times 37 = 74$ वोटों की जरूरत होगी, जिसके बाद उसके पास 29 अतिरिक्त वोट ($103 – 74 = 29$) बचेंगे। यदि अखिलेश यादव तीसरा उम्मीदवार उतारते हैं, तो उन्हें जीत के लिए 8 और विधायकों ($37 – 29 = 8$) के समर्थन की आवश्यकता होगी।
भाजपा का संख्या बल और क्रॉस वोटिंग पर टिकी निगाहें
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पास अपने 255 विधायक हैं। सहयोगी दलों—अपना दल (एस) के 13, आरएलडी के 9, एसबीएसपी के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायकों के साथ एनडीए का आंकड़ा 288 तक पहुंचता है। इसके अलावा बागी सपा विधायकों (पूजा पाल, मनोज पांडे, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह) और जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के 2 विधायकों को मिलाकर यह संख्या 294 हो जाती है।
भाजपा को आठ उम्मीदवारों को जिताने के लिए कुल $8 \times 37 = 296$ वोटों की आवश्यकता है। आठवें उम्मीदवार (10वीं सीट) को जिताने के लिए भाजपा को कम से कम 2 और वोटों ($296 – 294 = 2$) की दरकार है। ऐसे में भाजपा की नजरें सपा खेमे के संभावित असंतुष्टों पर टिकी हैं, वहीं उसे अपने कुछ सहयोगियों से सेंधमारी का डर भी सता रहा है।















