Vat Savitri Vrat 2026: वट सावित्री व्रत पर इस बार बन रहा है शनि अमावस्या का दुर्लभ संयोग, जानें शुभ मुहूर्त और अखंड सौभाग्य की पूजा विधि

Vat Savitri Vrat 2026 Date and Shubh Muhurat: हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत न केवल पति की लंबी आयु की कामना के लिए रखा जाता है, बल्कि यह प्रेम, त्याग और अटूट विश्वास का प्रतीक भी है। साल 2026 में वट सावित्री व्रत बेहद खास होने वाला है, क्योंकि इस दिन शनि अमावस्या का एक अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व इस बार भक्तों के लिए विशेष फलदायी सिद्ध होगा।

माता सावित्री और यमराज की कथा से जुड़ा है महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर पतिव्रता सावित्री ने अपने अटूट संकल्प और बुद्धि चातुर्य से मृत्यु के देवता यमराज को पराजित कर अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। तब से ही सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए हर वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या को बरगद (वट) के वृक्ष की पूजा करती हैं। उत्तर भारत के साथ-साथ गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में भी इस पर्व की बड़ी धूम रहती है।

वट सावित्री व्रत 2026: तिथि और समय

पंचांग गणना के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई 2026 को तड़के 05 बजकर 11 मिनट पर होगी, जो उसी रात 01 बजकर 32 मिनट तक रहेगी। सनातन धर्म में उदया तिथि की महत्ता को देखते हुए वट सावित्री व्रत 16 मई, शनिवार को ही रखा जाएगा। शनिवार के दिन अमावस्या होने से यह ‘शनि अमावस्या’ का संयोग भी बना रही है, जिससे इस दिन किया गया दान और पूजन कई गुना अधिक पुण्य प्रदान करेगा।

पूजा के लिए सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त

16 मई को वट सावित्री व्रत की पूजा के लिए अभिजीत मुहूर्त सबसे उत्तम माना जा रहा है। सुहागिन महिलाएं सुबह 11 बजकर 51 मिनट से दोपहर 12 बजकर 45 मिनट के बीच वट वृक्ष की विधि-विधान से पूजा कर सकती हैं। इस दौरान बरगद के पेड़ की परिक्रमा करना और उस पर रक्षा सूत्र बांधना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।

क्यों खास है वट वृक्ष की पूजा?

हिंदू धर्म में बरगद यानी वट वृक्ष को पूजनीय माना गया है। मान्यता है कि इस वृक्ष में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का वास होता है। वट सावित्री व्रत के दिन इस वृक्ष की पूजा करने से न केवल पति को दीर्घायु प्राप्त होती है, बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि का भी आगमन होता है। सुहागिनें इस दिन नए वस्त्र धारण कर, सोलह श्रृंगार करके सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं और बांस के पंखे से हवा करने की परंपरा का निर्वाह करती हैं, जो वैवाहिक जीवन के कष्टों को दूर करने का प्रतीक माना जाता है।

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