SIR पर उत्तराखंड में आरोप प्रत्यारोप, आंकड़ों की तस्वीर क्या कहती है

देहरादून, उत्तराखंड. उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। विपक्ष की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि इस प्रक्रिया के जरिए वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और बड़ी संख्या में लोगों को नोटिस भेजकर उन्हें मताधिकार से बाहर करने की कोशिश की जा रही है। राहुल गांधी और CJP से जुड़े नेताओं ने देशभर में SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं और उत्तराखंड में भी बड़ी संख्या में नोटिस तथा आपत्तियों को अपने आरोपों के समर्थन में रखा है।

लेकिन उत्तराखंड के आंकड़ों को थोड़ा विस्तार से देखने पर तस्वीर केवल आरोपों तक सीमित नहीं रहती।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि SIR कोई नई व्यवस्था नहीं है। मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पहले भी कई बार हो चुकी है। इसका मूल उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या दोहरी प्रविष्टियों जैसी समस्याओं को दूर करना है। उत्तराखंड में भी बूथ स्तर के अधिकारी घर घर जाकर मतदाताओं की जानकारी का सत्यापन कर रहे हैं। राज्य के आधिकारिक चुनावी पोर्टल पर SIR से संबंधित अलग व्यवस्था, ड्राफ्ट मतदाता सूची और अनुपस्थित, स्थानांतरित तथा मृत मतदाताओं की सूचियां उपलब्ध कराई गई हैं।

विपक्ष के आरोपों में करीब 20 लाख SIR नोटिस और 8 लाख से अधिक ASDD श्रेणी में चिन्हित मतदाताओं का जिक्र किया गया है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नोटिस या ASDD में किसी प्रविष्टि का चिन्हित होना अपने आप में मतदाता का नाम अंतिम रूप से हट जाना नहीं है। ASDD का इस्तेमाल अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टियों जैसी स्थितियों की पहचान के लिए किया जाता है।

दरअसल, SIR की पूरी प्रक्रिया में कई चरण हैं। पहले जानकारी जुटाई जाती है, फिर उसका सत्यापन होता है। इसके बाद जहां जरूरत होती है वहां नोटिस और आपत्तियों की प्रक्रिया शुरू होती है। उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भी कहा है कि मतदाता अपने नाम, पते या दूसरी जानकारी में किसी गलती को जरूरी दस्तावेज देकर ठीक करा सकते हैं। अधिकारियों ने यह भी कहा है कि ऐसे मामलों को बूथ स्तर पर ही निपटाने के निर्देश दिए गए हैं, जबकि जिन मतदाताओं की जानकारी का मिलान नहीं हो पाया है, उनके मामलों को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के स्तर पर देखा जाएगा।

यानी नोटिस को सीधे नाम कटने से जोड़ना सही तस्वीर नहीं देता।

उत्तराखंड में SIR को लेकर एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा Form 10 के जरिए दाखिल आपत्तियों का है। राज्य में कुल 59,604 आपत्तियां दर्ज की गईं। इनमें से 40,906 मामले ऐसे मतदाताओं से संबंधित बताए गए हैं जो अपने पंजीकृत पते पर नहीं मिले या स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके थे। यह कुल आपत्तियों का करीब 69 प्रतिशत है।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि आपत्तियों का एक बड़ा हिस्सा मतदाताओं के स्थान बदलने या उनके पंजीकृत पते पर नहीं मिलने से जुड़ा है। हालांकि इसका यह अर्थ भी नहीं निकाला जाना चाहिए कि हर अनुपस्थित मतदाता अपात्र है। चुनाव अधिकारियों ने खुद इस बात पर जोर दिया है कि केवल किसी व्यक्ति के घर पर नहीं मिलने को नाम हटाने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। इसलिए ऐसे मामलों में सत्यापन और सुनवाई की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।

यहीं विपक्ष के आरोप और चुनावी प्रक्रिया के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति दर्ज होना और उसका नाम अंतिम रूप से मतदाता सूची से हटना दो अलग-अलग बातें हैं। आपत्ति एक प्रक्रिया शुरू करती है, अंतिम फैसला नहीं सुनाती।

उत्तराखंड के चुनाव अधिकारियों के मुताबिक आपत्ति वाले मामलों में संबंधित पक्षों को सुनने और सत्यापन के बाद निर्णय लेने की व्यवस्था है। इसलिए SIR पर बहस करते समय नोटिस, आपत्ति और अंतिम रूप से नाम हटाए जाने को एक ही चीज मानना तस्वीर को अधूरा कर सकता है।

राज्य में जारी आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि SIR केवल विपक्षी मतदाताओं या किसी एक वर्ग से जुड़ी प्रक्रिया नहीं है। अगस्त में उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी बी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम को भी उनके नाम में विसंगति के कारण SIR नोटिस मिला था। उन्होंने जरूरी दस्तावेज बूथ स्तर के अधिकारी को उपलब्ध कराए। इससे कम से कम इतना जरूर स्पष्ट होता है कि नोटिस जारी होना अपने आप में किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर करने का अंतिम फैसला नहीं है।

यहां एक और पहलू ध्यान देने योग्य है। SIR के दौरान करीब 24.30 लाख नोटिस जारी किए जाने की जानकारी भी चुनाव अधिकारियों की ओर से सामने आई थी, जिनमें से लगभग 20.27 लाख नोटिस मतदाताओं तक पहुंचाए जा चुके थे। यानी नोटिस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाताओं को जानकारी देना और विसंगतियों को दूर करने का अवसर देना भी है।

बेशक, इसका मतलब यह नहीं है कि SIR को लेकर उठाए गए हर सवाल को नजरअंदाज कर दिया जाए। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं से जुड़ी प्रक्रिया में गलतियां या प्रशासनिक चूक की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर किसी वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से प्रभावित होता है तो उस मामले की शिकायत और सुधार जरूरी है। लेकिन किसी प्रक्रिया में संभावित गलती और पूरी प्रक्रिया को राजनीतिक साजिश बताने के बीच भी अंतर है।

यही वजह है कि उत्तराखंड में SIR की असली तस्वीर का आकलन अंतिम परिणामों से होना चाहिए। कितने नाम केवल सत्यापन के लिए चिन्हित किए गए, कितने मामलों में मतदाताओं ने अपने दस्तावेज जमा किए, कितने नाम बरकरार रहे, कितने नाम दोबारा शामिल हुए और कितने मामलों में जांच के बाद नाम हटाना सही पाया गया इन सवालों के जवाब ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे।

राजनीतिक आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन मतदाता सूची एक तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया से तैयार होती है। इसलिए 20 लाख नोटिस, 8 लाख से अधिक ASDD प्रविष्टियां या 59,604 आपत्तियों जैसे आंकड़ों को अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय पूरी प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों के रूप में देखना जरूरी है।

उत्तराखंड में SIR को लेकर बहस जारी रह सकती है और राजनीतिक दल अपने-अपने दावे करते रहेंगे। लेकिन मतदाता के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि उसका नाम मतदाता सूची में है या नहीं और अगर किसी कारण से उस पर सवाल उठा है तो क्या उसे अपना पक्ष रखने और अपना नाम सुरक्षित रखने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है। फिलहाल उपलब्ध प्रक्रिया यही बताती है कि नोटिस और आपत्ति अपने आप में अंतिम वंचना नहीं हैं; अंतिम तस्वीर सत्यापन और उसके बाद लिए गए निर्णयों से ही सामने आएगी।

 

 

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