
नेपाल में आई हालिया फ्लैश फ्लड (आकस्मिक बाढ़) ने पूरे देश को गहरे जख्म दिए हैं। साल 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद नेपाल ने पहली बार कुदरत का इतना विकराल और खौफनाक रूप देखा है। स्थानीय अधिकारियों का मानना है कि नेपाल के इतिहास में ऐसी भीषण तबाही पहले कभी दर्ज नहीं की गई। इस आपदा के बाद अब यह पता लगाने की कोशिशें तेज हो गई हैं कि आखिर जलप्रलय की मुख्य वजह क्या थी और इतनी बड़ी तबाही की भनक पहले क्यों नहीं लगी? सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब तिब्बत में ग्लेशियर टूट रहे थे या हिमनद खिसक रहे थे, तो अत्याधुनिक तकनीक से लैस चीन को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? और यदि चीन को इसकी भनक थी, तो उसने समय रहते नेपाल को सतर्क क्यों नहीं किया?
नेपाल और चीन के बीच बढ़ा कूटनीतिक तनाव: दावे और प्रतिदावे
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ अपने पीछे इंसानियत की लाचारी की कहानी छोड़ गई है। इस त्रासदी ने नेपाल और चीन के बीच कूटनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। नेपाल ने आशंका जताई है कि चीनी क्षेत्र में बनी ‘जियोलॉजिकल डिजास्टर डैम’ के टूटने से यह सैलाब आया और चीन ने इसकी समय पर पूर्व चेतावनी जारी नहीं की। दूसरी ओर, चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे फर्जी खबर करार दिया है। चीनी दूतावास का दावा है कि भूस्खलन जैसी घटना नेपाली सीमा के भीतर हुई, जिससे कीचड़ का बड़ा सैलाब आया।
नदी इंजीनियरिंग और सेफ्टी वॉल पर उठे सवाल
इस तबाही के बाद अब चीन की विकास परियोजनाओं की समीक्षा की मांग उठ रही है। गौरतलब है कि इसी साल अप्रैल में नेपाल ने चीन से भोटेकोशी नदी के किनारे बन रही सेफ्टी वॉल (सुरक्षा दीवार) का निर्माण रोकने का अनुरोध किया था। नेपाल को अंदेशा था कि इस संरचना से नदी का प्राकृतिक बहाव बाधित हो सकता है। यद्यपि अभी तक इस बात का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है कि सेफ्टी वॉल के कारण ही बाढ़ आई, लेकिन नदी इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का मानना है कि स्वाभाविक बहाव में रुकावट आने से पानी और मलबे का दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है, जिसकी जांच होना बेहद जरूरी है।
45 मिनट की देरी और रियल-टाइम वार्निंग सिस्टम की विफलता
बाढ़ का मुख्य स्रोत तिब्बत का केरुंग क्षेत्र माना जा रहा है। नेपाली सूत्रों के अनुसार, तिब्बत से आई बाढ़ की सूचना नेपाल को करीब 45 मिनट की देरी से मिली। चीनी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तिब्बत में स्थानीय समयानुसार सुबह 10:30 बजे ही बाढ़ आ चुकी थी। यह स्थान नेपाल सीमा से महज 25 से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नेपाल और चीन के समय में लगभग सवा 2 घंटे का अंतर होने के बावजूद सूचना मिलने में हुई यह देरी सवाल खड़े करती है। यदि दोनों देशों के बीच ‘रियल-टाइम फ्लड वार्निंग सिस्टम’ प्रभावी ढंग से काम करता, तो निचले इलाकों से लोगों को सुरक्षित निकालने का पर्याप्त समय मिल सकता था।
भारत के लिए भी चिंता का विषय: भविष्य की बड़ी आपदा का संकेत
इस प्राकृतिक आपदा से चीन के ग्यिरोंग क्षेत्र का इंफ्रास्ट्रक्चर भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है, जिससे यह साबित होता है कि अनियंत्रित निर्माण कार्य जलवायु परिवर्तन के दौर में खुद चीन के लिए भी सुरक्षित नहीं हैं। यह मुद्दा केवल नेपाल तक सीमित नहीं है; भोटेकोशी का पानी त्रिशूली और नारायणी (गंडक) नदियों से होता हुआ सीधे भारत के बिहार राज्य तक पहुंचता है। तिब्बत के पठार पर ग्लेशियर पिघलने, लैंडस्लाइड और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की बढ़ती घटनाएं पूरे दक्षिण एशिया के लिए रणनीतिक और पर्यावरणीय खतरा बनती जा रही हैं।














