
-यूपी और पश्चिम बंगाल में दोनो बनेगे एक दूसरे की जरूरत
-औवेसी के पहुचने से बंगाल मे ंमुस्लिम वोट बैंक बिखरने का खतरा
-सपा-कांग्रेस के बाद माया को चाहिए यूपी मे बड़ा सहारा
योगेश श्रीवास्तव
लखनऊ। साल २०२१ में जिन चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले है उनमें पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए नाक का सवाल बना हुआ है। चुनाव से पहले ही भाजपा नेतृत्व की जिस तरह कवायद वहां चल रही है उसके बाद से इस बार तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता की राह दुश्वार भरी होगी इस संभावना से राजनीतिक प्रेक्षकों को इंकार नहंी है। भाजपा के अलावा कुछ क्षेत्रीय दल भी उनकी राह में कांटे बिछाने के लिए अभी से पहुंचने से शुरू हो गए है। बिहार में अपेक्षानुसार परिणाम आने के बाद असुवद्दीन औवेसी और बसपा का गठबंधन भी वहां ममता के मुस्लिम वोट बैंक में सेध लगाने पहुुच रहां है।
एक के बाद एक भरोसे के लोगों के पार्टी छोडऩे से हलकान ममता बनर्जी के लिए इस बार का चुनाव काफी मुश्किल सा लग रहा है। भाजपा ने जिस तरह तृणमूल कांग्रेस के पुराने वफादारों में तोडऩे और उन्हे अपने पाले में लाने की मुहिम शुरू की है उससे इस बार के चुनाव में वहां तृणमूल कांग्रेस का तंबू उखडऩे के साथ भाजपा की सरकार बनने की संभावनाओं स राजनीतिक प्रेक्षकों को इकार नहीं है। पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा और टीएमसी के बीच होने वाले सीधे मुकाबले के बीच दलित मुस्लिम गठजोड़ भी करिश्मा दिखाने को तैयार हो रहा है।
हांलाकि पश्चिम बंगाल में बहुजन समाज पार्टी का कोई सियासी आधार नहीं है पर पश्चिम बंगाल मे औवेसी का साथ देकर मायावती यूपी में मुस्लिम वोटों का लाभ लेने के लिए तैयारी कर रही है। साल २०१९ के लोकसभा चुनाव के बाद हुए यूपी के विधानसभा उपचुनावों में बसपा चारो खाने चित होने के बाद अब पश्चिम बंगाल में औवेसी के सहारे कुछ सीटे हासिल करके यूपी चुनाव का माहौल बनाने में लगी है। इसी साल बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा और ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी मिलकर भले ही कोई बड़ा करिश्मा न दिखा सके हों, लेकिन आधा दर्जन सीटें जीतने में जरूर कामयाब रहे हैं। इसके बाद से उत्तरप्रदेश में भी उनके गठबंधन करने की अटकलें तेज हो गयी हैं।
यूपी में करीब 21 फ ीसदी दलित और 20 फ ीसदी मुस्लिम हैं। यही देखकर मायावती असदुद्दीन ओवैसी के साथ चुनाव लडऩे का मन बना सकती हैं। यूपी में दलित मुस्लिम गठजोड़ के प्रयोग पहले भी दोहराए जाते रहे हैं। पर मोदी उदय के बाद से इस तरह के प्रयासों में कमी आई है। बिहार में जरूर यह प्रयोग दोहराया गया। पर वहां भी थोड़ी सफ लता मिलने के बाद इस बात पर फि र से राजनीतिक दलों ने अपनी कवायद तेज कर दी है।
यूपी की तरह ही पश्चिम बंगाल में भी दलितों की संख्या कम नहीं है पर यह वोट अभी टीएमसी के पास है। पर भाजपा विधानसभा चुनाव को लेकर इस वोट बैंक पर अपनी पैनी निगाह रखे हुए है। वहीं ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को लग रहा है कि मुस्लिम वोटों के साथ ही दलित वोट अगर हासिल हो जाता है उनकी पार्टी को इसका बड़ा लाभ मिल सकता है। वहीं मायावती पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद यूपी में फिर से सत्ता हासिल करने के लिए ब्राम्हणों के साथ मुस्लिम दलित गठजोड का सीधा लाभ उठाने की रणनीति तैयार करने में जुटी हैं।
लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन कर दस सीटे हासिल करने के बाद अब मायावती को एक बार फिर यूपी में ऐसे उपयुक्त गठबंधन की तलाश है जो उन्हे मुख्य धारा में लाकर खड़ा कर दे। इस समय में बसपा सदन से सड़क तक तीसरी पायदान पर खड़ी है। बसपा के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती अपने को मुख्य लड़ाई में शामिल करने की है जिसके लिए वह किसी से गठबंधन के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।











